भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
  काव्य मोती
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

अकेला हूँ मैं, हमसफ़र ढूँढ़ता हूँ / राजा मेंहदी अली खान

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

अकेला हूँ मैं हमसफ़र ढूँढता हूँ,
मौहब्बत की मैं रहगुज़र ढूँढ़ता हूँ,
मैं सीने में शामिल सहर ढूँढ़ता हूँ ।

ये महकी हुई रात कितनी हँसी है,
मगर मेरे पहलू में कोई नहीं है,
मौहब्बत भरी एक नज़र ढूँढ़ता हूँ ।

मेरे दिल में आजा निगाहों में आजा,
मौहब्बत की रंगीन राहों में आजा,
तुझी को मैं अब बेख़बर ढूँढ़ता हूँ ।

किधर जाऊँ वीरान हैं मेरी राहें,
किसी को न अपना सकीं मेरी आहें,
मैं आहों में अपनी असर ढूँढ़ता हूँ ।

फ़िल्म : जाल (1967)