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अक्स है जामिद कि दरिया मुंजमिद है / शहबाज़ 'नदीम' ज़ियाई

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अक्स है जामिद कि दरिया मुंजमिद है
या सर-ए-नज़्ज़ारा चेहरा मुंजमिद है

होंट हैं ख़ामोश लहजा मुंजमिद है
ज़िंदगी का इस्तिआरा मुंजमिद है

दिल में ख़्वाहिश है न जज़्बों में हरारत
ख़ून शिरयानियों में गोया मुंजमिद है

देख कर शहर-ए-ख़मोशाँ की फ़ज़ाएँ
यूँ लगा जेसे कि दुनिया मंुजमिद है

ख़्वाब की देहलीज़ पर रक्खी है आँखें
और बे-ख़्वाबी का लम्हा मुंजमिद है

इश्क़ अफ़सुर्दा तबीअत है सर-ए-बज़्म
पायलें चुप हैं कि नग़मा मुंजमिद है

नब्ज़ आँखें ज़ेहन सोचें दिल की धड़कन
एक ही पैकर में क्या क्या मुुंजमिद है

एक साअत वस्ल-लज़्ज़त बे-निशाँ सी
एक लम्हा हिज्र आसा मंुजमिद है

एक मौसम अश्क वाला ठहरा ठहरा
एक मौसम दर्द जैसा मुंजमिद है

क्या अजब है मंज़िलों की जुस्तुजू में
मैं रवाँ हूँ और रस्ता मुंजमिद है

आज कल कुछ बे-हिसी तारी है ‘शहबाज़’
आज कल हर एक रिश्ता मुंजमिद है