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अगर-मगर / अरुण देव

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तुम अगर नदी रहती तो मैं एक नाव बन तैरता रहता
अगर तुम वृक्ष रहतीं तो बया बन एक घोसला बनाता तुम्हारे हरे पत्तों के बीच
अगर तुम कपास रहती बन जाता वस्त्र छापे का रंग बन चढ़ जाता
कि धोने से भी न उतरता

अगर तुम आँधी रहती तो मैं एक तिनका बन उसके भँवर में घूमता ही रहता
कभी नहीं निकलता उससे बाहर
अगर शून्य होती तो तुम्हारे आगे कोई अंक बन जुड़ जाता
हो जाती तुम अनेक

जैसे एक घर से मुझे विदा करती
दूसरी बस में मेरे बगल में आ बैठती
तीसरी मेरा कालेज में इंतज़ार कर रही होती
चौथी मेरी क्लास में बैठी होती
पाँचवी के साथ कैंटीन में डोसा खाता
छठी मुझे बस स्टैंड तक छोड़ने आती
सातवीं बस में मेरे लिए अपने बगल वाली सिट रिर्जव रखती
आठवीं के साथ फ़िल्म देख कर आता
नौंवीं के साथ किसी किताब की दुकान पर कविता पर चर्चा करता
घर लौटता तो फिर पहली मिलती

और इस तरह तुम्हारे हर रूप में तुम्हारे साथ रहता