भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

अगर अनार में वो रौशनी नहीं भरता / रऊफ़ खैर

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

अगर अनार में वो रौशनी नहीं भरता
तो ख़ाक-सार दम-ए-आगही नहीं भरता

ये भूक प्यास बहर-हाल मिट ही जाती है
मगर है चीज़ तो ऐसी कि जी नहीं भरता

तू अपने आप में माना कि एक दरिया है
मिरा वजूद भी कूज़ा सही नहीं भरताब

ये लेन-देन की अपने हदें भी होती हैं
कि पेट भरता है झोली कोई नहीं भरता

हमारा कोई भी नेमुल-बदल नहीं होगा
हमारी ख़ाली जगह कोई भी नहीं भरता

मुआफ़ करना ये ख़ाका कहाँ उभरता है
अगर ये दस्त-ए-हुनर रंग ही नहीं भरता

कहाँ ये ‘ख़ैर’ कहाँ हार जीत का ख़दशा
कि जिस्म ओ जान की बाज़ी से जी नहीं भरता