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अगर कहीं... / योगेन्द्र दत्त शर्मा

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अगर पेड़ पर लटकी होतीं
रंग-बिरंगी मछली,
तो मैं उनसे बातंे करता
ढेरों अगली-पिछली!

अगर नदी में सेब, संतरा
या अनार ही उगता,
तो मैं बीच धार में जाकर
उसके दाने चुगता!
चंदा गोल न होकर
कुछ चौकोर अगर हो जाता,
तो मैं उसमें डोर बाँधकर खूब पतंग उड़ाता!

सूरज अगर कहीं बन जाता
एक बर्फ का गोला,
तो मैं उसको तोड़-तोड़कर
भरता अपना झोला!

बादल कोई आसमान से
नीचे अगर उतरता,
तो मैं उसका रथ बनवाकर
खूब सवारी करता!

लेकिन मन का चाहा
पूरा भला कहीं हो पाता?
आखिर अपना मन मसोसकर
मैं बैठा रह जाता!