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अगर गुलशन तरफ़ वो नो ख़त-ए-रंगीं / वली दक्कनी

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अगर गुलशन तरफ़ वो नो ख़त-ए-रंगीं अदा निकले
गुल-ओ-रेहाँ सूँ रंग-ओ-बू शिताबी पेशवा निकले

खुले हर ग़ुंच-ए-दिल ज्‍यूँ गुल-ए-शादाब शादी सूँ
अगर टुक घर सूँ बाहर वो बहार-ए-दिल कुशा निकले

ग़नीम-ए-ग़म किया है फ़ौज बंदी इश्‍क़ बाराँ पर
बजा है आज वो राजा अगर नोबत बजा निकले

निसार उसके क़दम ऊपर करूँ अंझुवाँ के जौहर सब
अगर करने को दिलजोई वो सर्व-ए-ख़ुश अदा निकले

सनम आए करूँगा नाला-ए-जाँ सोज़ क्‍यूँ ज़ाहिर
मगर उस संग दिल सूँ महरबानी की सदा निकले

रहे मानिंद-ए-लाल-ए-बेबहा शाहाँ के ताज ऊपर
मुहब्‍बत में जो कुई असबाब-ए-ज़ाहिर कूँ बहा निकले

बख़ीली दरस की हरगिज़ न कीजो ऐ परी पैकर
'वली' तेरी गली में जबकि मानिंद-ए-गदा निकले।