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अगर दिल में चाहत बसाई न होती / सुनीता पाण्डेय 'सुरभि'

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अगर दिल में चाहत बसाई न होती।
तो दिल पर कभी चोट खाई न होती॥

मुहब्बत की शम्मा जलाई न होती।
तो दुश्मन ये सारी खुदाई न होती॥

चमन मेरे दिल का उजड़ता नहीं ये-
यूँ दिल की कली मुस्कुराई न होती।

रुलाया न होता तेरी याद ने गर-
लबों पर मैं फरियाद लाई न होती।

मेरे हाथ की इन लकीरों में तेरा-
अगर नाम होता जुदाई न होती।

ज़माना भी होता न दुश्मन हमारा-
जो शामिल तेरी बेवफ़ाई न होती।

जो तन्हा ही रहना था मुझको 'सुनीता' -
तो बेहतर था दुनिया में आई न होती।