भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

अगर मुझ कन तू ऐ रश्क‍-ए-चमन होवे / वली दक्कनी

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

अगर मुझ कन तू ऐ रश्‍क-ए-चमन होवे तो क्‍या होवे
निगह मेरी का तेरा मुख वतन होवे तो क्‍या होवे

सियह रोज़ाँ के मातम की सियाही दफ़्अ करने कूँ
अगर यक निस तू शम्‍मे-अंजुमन होवे तो क्‍या होवे

तेरी बाताँ के सुनने का हमेशा शौक़ है दिल में
अगर यकदम तूँ मुझ सूँ हमसुख़न होवे तो क्‍या होवे

हुआ जो शौक़ में तुझ देखने के ऐ हलाल अबरू
उसे अँखियाँ के पर्दे का कफ़न होवे तो क्‍या होवे

अगर ग़ुंचा नमन इक रात इस हस्‍ती के गुलशन में
'वली' मुझ बर में वो गुल पैरहन होवे तो क्‍या होवे