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अगर वक्त के हम यों मारे न होते / चेतन दुबे 'अनिल'

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अगर वक्त के हम यों मारे न होते
तुम्हारी कसम हम तुम्हारे न होते

नहीं बहती धरती पे सरिता सुहावन
अगर दो नदी के किनारे न होते

बनाकर तुम्हें जो न कर झारता विधि
तो अम्बर में झिलमिल सितारे न होते

गोरी गोपियों को वे कैसे रिझाते
अगर जो कन्हैया जी कारे न होते

अगर गोपियों के जो बहते न आँसू
तो सचमुच समन्दर भी खारे न होते

नहीं मिलती मुस्कान मुझको तुम्हारी
अगर चार आँसू यों ढारे न होते

बड़े चैन की नींद सोता उमर भर
अगर प्राण तुम पर यों वारे न होते

नहीं आती मुस्कान अब तक अधर पर
अगर अश्क तुमने उबारे न होते