भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

अचु त जाम सां जाम टकरायूं / लीला मामताणी

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

अचु त जाम सां जाम टकरायूं
अञा त राति बाक़ी आ
कुछ तूं चवंदें कुछ मां चवंदसि
अञा त राति बाक़ी आ

अचु त गले मिलूं मिठल हीउ वेल वरी मिले न मिले
अलाए छो दिलि घॿराए थी हली आ कली खिले न खिले
अञा त राति बाक़ी आ

ज़िंदगीअ जी गहरायुनि में अंधेरो ही अंधेरो आ
तड़े कढूं ऐं जोति जलायूं
ही मायुसियुनि जो घेरो आ
अचु त कयूं इक़ार-अञा राति बाक़ी आ

ॾिस त मुंहिंजी अखड़ियुनि जा गुलाबी डोरा छाथा चवनि
प्यार ही हित प्यार आ तोखे पिया सॾड़ा कनि
मञु मुंहिंजी मिनथ मिठड़ा अञा त राति बाक़ी आ
जाम सां अॼु जाम टकरे अञा त राति बाक़ी आ