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अजनबी / रेशमा हिंगोरानी

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लुभा गया कोई जाना सा अजनबी मुझको…
मेरी सूखी हुई कलम में सियाही भरने,
मेरी बेजान सी नब्जों को जाँ-फिज़ा[1] करने,

कौन है,
कौन है तू,
अजनबी,
पता तो बता?

मेरी यादों के कटघरे[2] में तू मुज्रिम भी नहीं,
शरीक़े-ज़िंदगी[3], न कोई हमसफ़र[4] मेरा!

कौन तू अजनबी,
कहाँ से चला आया है?
मुझे पेहचानता है,
जानता नहीं है मगर!
कहाँ मिला था,
कब मिला था,
मुझे याद नहीं!
हाँ, एक धुंदला-सा,
साया जो हुआ करता था…
कभी नज़र तो न आया,
मगर छुपा भी न था,
दूर, जो दूर,
कहीं दूर रहा करता था...
अभी यहाँ, कभी वहाँ,
कहीं तू ही तो न था?

शब्दार्थ
  1. जान डाल देना / तरो-ताज़ा कर देना
  2. कैद
  3. जिंदगी भर का साथी
  4. साथ चलने वाला