भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

अणु-महान्‌ तुम! अणु-महान्‌ में / हनुमानप्रसाद पोद्दार

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

 (राग भीमपलासी-ताल कहरवा)

 अणु-महान्‌ तुम! अणु-महान्‌में भरे पूर्ण रहते भगवान।
 अमित विभिन्न नाम-रूपों में व्यक्त तुम्हीं अव्यक्त समान॥
 देखूँ सदा तुम्हीं को सबमें, करूँ सभीका मैं सम्मान।
 विनय-विनम्र हृदयसे सबको करूँ प्रणाम बिना अभिमान॥
 स्वसुख-दुःखमें सम देखूँ मैं तुम्हें, तुहारा पा वरदान।
 सुखमय, नित निर्द्वन्द्व बनूँ मैं, रहे न मन कुछ भी अरमान॥
 पर पर-दुःख दुखी हो पर-सुख-हेतु करूँ निज सुखका दान।
 हरण करूँ पर-दुःख, वरण मैं करूँ उसे मन मोद महान॥
 सबके हित-सुखमें ही समझूँ अपना हित-सुख परम अमान।
 समझूँ अति सौभाग्य, करूँ मैं नहीं कभी भी कुछ अहसान॥