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अतिथि सूरज / कुमार रवींद्र

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अतिथि सूरज !
तुम कहाँ से आ रहे हो

तुम नहीं लगते
हमारे सूर्यकुल के
अभी भी गहरे धुएँ हैं
उधर पुल के

गुंबदों के
सिरे पर तुम छा रहे हो

ग़लत तिथि पर
धूप का होना अचानक
ख़ुशबुओं के ये तुम्हारे
नए बानक

यों ...
हमारी साँस को भरमा रहे हो

दूर सागर-पार की
महिमा तुम्हारी
हम, इसी से
जल हमारे हुए खारी

मन्त्र उलटे
हर घड़ी तुम गा रहे हो