भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

अथ राग सूहा / दादू ग्रंथावली / दादू दयाल

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

अथ राग सूहा

(गायन समय दिन 9 से 12)

354. विनती। एकताल

तुम बिच अंतर जिन परे माधव, भावै तन-धन लेहु।
भावै स्वर्ग-नरक रसातल, भावै करवत देहु॥टेक॥
भावै विपति देहु दुख संकट, भावै सम्पत्ति सुख शरीर।
भावै घर-वन राव-रंक कर, भावै सागर तीर माधवे॥1॥
भावै बन्ध मुक्त कर माधव, भावै त्रिभुवन सार।
भावै सकल दोष धर माधव, भावै सकल निवार माधवे॥2॥
भावै धरणि गगन धर माधव, भावै शीतल सूर।
दादू निकट सदा सँग माधव, तू जिन होवे दूर माधवे॥3॥

355. परिचय। पंजाबी त्रिताल

अब हम राम सनेही पाया, आगम अनहद सौं चित लाया॥टेक॥
तन-मन आतम ताको दीन्हा, तब हरि हम अपना कर लीन्हा॥1॥
वाणी विमल पंच पराना, पहली शीश मिले भगवाना॥2॥
जीवित जन्म सफल कर लीन्हाँ, पहली चेते तिन भल कीन्हाँ॥3॥
अवसर आपा ठौर लगावा, दादू जीवित ले पहुँचावा॥4॥


अथ काया बेली ग्रन्थ

356. पिंड ब्रह्मांड शोधन। पंजाबी त्रिताल

साँचा सद्गुरु राम मिलावे, सब कुछ काया माँहिं दिखावे॥टेक॥
काया माँहीं सिरजनहार, काया माँहीं है ओंकार।
काया माँहीं है आकाश, काया माँहीं धरती पास॥1॥
काया माँहीं पवन प्रकाश, काया माँहीं नीर निवास।
काया माँहीं शशिहर सूर, काया माँहीं बाजै तूर॥2॥
माया माँहीं तीनों देव, काया माँहीं अलख अभेव।
काया माँहीं चारों वेद, काया माँहीं अलख अभेव।
काया माँहीं चारों वेद, काया माँहीं पाया भेद॥3॥
काया माँहीं चारों खाणी, काया माँहीं चारों वाणी।
काया माँहीं उपजे आइ, काया माँहीं मर-मर जाइ॥4॥
काया माँहीं जामे मरे, काया माँहीं चौरासी फिरे।
काया माँहीं ले अवतार, काया माँहीं बारम्बार॥5॥
काया माँहीं रात-दिन, उदय-अस्त इकतार।
दादू पाया परम गुरु, कीया एकंकार॥6॥

357. त्रिताल

काया माँहीं खेल पसारा, काया माँहीं प्राण अधारा।
काया माँहीं अठारह भारा, काया माँहीं उपावनहारा॥1॥
काया माँहीं सब वन राइ, काया माँहीं रहे घर छाइ।
काया माँहीं कंदलि वासा, काया माँहीं है कैलाशा॥2॥
काया माँहीं तरुवर छाया, काया माँहीं पंखी माया।
काया माँहीं आदि अनन्त, काया माँहीं है भगवन्त॥3॥
काया माँहीं त्रिभुवनराइ, काया माँहीं रहे समाइ।
काया माँहीं चौदह भुवन, काया माँहीं आवागमन॥4॥
काया माँहीं सब ब्रह्मंड, काया माँहीं है नव खंड।
काया माँहीं स्वर्ग पयाल, काया माँहीं आप दयाल॥5॥
काया माँहीं लोक सब, दादू दिये दिखाइ।
मनसा वाचा कर्मना, गुरु बिन लख्या न जाइ॥6॥

358. रंग ताल

काया माँहीं सागर सात, काया माँहीं अविगत नाथ।
काया माँहीं नदियाँ नीर, काया माँहीं गहर गम्भीर॥1॥
काया माँहीं सरवर पाणी, काया माँहीं बसे विनाणी।
काया माँहीं नीर निवान, काया माँहीं हंस सुजान॥2॥
काया माँहीं गंग तरंग, काया माँहीं जमुना संग।
काया माँहीं सरस्वती, काया माँहीं द्वारावती॥3॥
काया माँहीं काशी स्थान, काया माँहीं करे स्नान।
काया माँहीं पूजा पाती, काया माँहीं तीरथ जाती॥4॥
काया माँहीं मुनिवर मेला, काया माँहीं आप अकेला।
काया माँहीं जपिये जाप, काया माँहीं आपै आप॥5॥
काया नगर निधान है, माँहीं कौतिक होइ।
दादू सद्गुरु संग ले, भूल पड़े जिन कोइ॥6॥

359. रंग ताल

काया माँहीं विखमी बाट, काया माँहीं औघट घाट।
काया माँहीं पट्टण गाँव, काया माँहीं उत्तम ठाँव॥1॥
काया माँहीं मण्डप छाजे, काया माँहीं आप विराजे।
काया माँहीं महल अवास, काया माँहीं निश्चल वास॥2॥
काया माँहीं राजद्वार, काया माँहीं बोलणहार।
काया माँहीं भरे भण्डार, काया माँहीं वस्तु अपार॥3॥
काया माँहीं नौ निधि होइ, काया माँहीं अठ सिधि सोइ।
काया माँहीं हीरा साल, काया माँहीं निपजे लाल॥4॥
काया माँहीं माणिक भरे, काया माँहीं ले ले धरे।
काया माँहीं रतन अमोल, काया माँहीं मोल न तोल॥5॥
काया माँहीं कर्तार है, सो निधि जाणे नांहि।
दादू गुरु मुख पाइये, सब कुछ काया माँहिं॥6॥

360. वर्ण भिन्न ताल

काया माँहीं सब कुछ जान, काया माँहीं लेहु निछान।
काया माँहीं बहु विस्तार, काया माँहीं अनन्त अपार॥1॥
काया माँहीं अगम अगाध, काया माँहीं निपजे साध।
काया माँहीं कह्या न जाइ, काया माँहीं रहे ल्यौ लाइ॥2॥
काया माँहीं साधन सार, काया माँहीं करे विचार।
काया माँहीं अमृत वाणी, काया माँहीं सारंग पाणी॥3॥
काया माँहीं खेले प्राण, काया माँहीं पद निर्वाण।
काया माँहीं मूल गह रहै, काया माँहीं सब कुछ लहै॥4॥
काया माँहीं निज निरधार, काया माँहीं अपरम्पार।
काया माँहीं सेवा करे, काया माँहीं नीझर झरे॥5॥
काया माँहीं वास कर, रहै निरन्तर छाइ।
दादू पाया आदि घर, सद्गुरु दीया दिखाइ॥6॥

361. वर्ण भिन्न ताल

काया माँहीं अनुभव सार, काया माँहीं करे विचार।
काया माँहीं उपजे ज्ञान, काया माँहीं लागे ध्यान॥1॥
काया माँहीं अमर स्थान, काया माँहीं आतम राम।
काया माँहीं कला अनेक, काया माँहीं कर्ता एक॥2॥
काया माँहीं लगे रंग, काया माँहीं साई संग।
काया माँहीं सरवर तीर, काया माँहीं कोकिल कीर॥3॥
काया माँहीं कच्छप नैन, काया माँहीं कुंजी बैन।
काया माँहीं कमल प्रकाश, काया माँहीं मधुकर वास॥4॥
काया माँहीं नाद कुरंग, काया माँहीं ज्योति पतंग।
काया माँहीं चातक मोर, काया माँहीं चन्द चकोर॥5॥
काया माँहीं प्रीति कर, काया माँहीं सनेह।
काया माँहीं प्रेमरस, दादू गुरुमुख येह॥6॥

362. राज विद्याधर ताल

काया माँहीं तारणहार, काया माँहीं उतरे पार।
काया माँहीं, दुस्तर तारे, काया माँहीं आप उबारे॥1॥
काया माँहीं दुस्तर तरे, काया माँहीं होइ उद्धरे।
काया माँहीं उपजे आइ, काया माँहीं रहै समाइ॥2॥
काया माँहीं खुले कपाट, काया माँहीं निरंजन हाट।
काया माँहीं है दीदार, काया माँहीं देखणहार॥3॥
काया माँहीं राम रँग राते, काया माँहीं प्रेम रस माते।
काया माँहीं अविचल भये, काया माँहीं निश्चल रहे॥4॥
काया माँहीं जीवे जीव, काया माँहीं पाया पीव।
काया माँहीं सदा अनन्द, काया माँहीं परमानन्द॥5॥
काया माँहीं कुशल है, सो हम देख्या आइ।
दादू गुरु मुख पाइए, साधु कहैं समझाइ॥6॥

363. राज विद्याधर ताल

काया माँहीं देख्या नूर, काया माँहीं रह्या भरपूर।
काया माँहीं पाया तेज, काया माँहीं सुन्दर सेज॥1॥
काया माँहीं पुंज प्रकाश, काया माँहीं सदा उजास।
काया माँहीं झिलमिल सारा, काया माँहीं सब तैं न्यारा॥2॥
काया माँहीं ज्योति अनन्त, काया माँहीं सदा वसन्त।
काया माँहीं खेले फाग, काया माँहीं सब वन बाग॥3॥
काया माँहीं खेलें रास, काया माँहीं विविध विलास।
काया माँहीं बाजैं बाजे, काया माँहीं नाद ध्वनि साजे॥4॥
काया माँहीं सेज सुहाग, काया माँहीं मोटे भाग।
काया माँहीं मँगलाचार, काया माँहीं जै जै कार॥5॥
काया अगम अगाध है, मांही तूर बजाइ।
दादू परगट पीव मिल्या, गुरुमुख रहे समाइ॥6॥

॥इति राग सूहा (काया बेली ग्रन्थ) सम्पूर्ण॥