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अदालत में औरत / कुमार सुरेश

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सर्दियों की उदास शाम
काला कोट पहनना ही चाहती है
शाम के रंग में घुली-मिली औरत
सोचती है उसे अब
वापस लौट ही जाना चाहिए

उसके साथ घिसटती
पांच-छः बरस की बच्ची की
खरगोश जैसी आँखों में थिर
उदासी की परछाईयों के बीच
भूख ने डेरा जमा लिया है
वह चकित उस ग्रह को
जानने की कोशिश कर रही है
जहाँ भुगतना है उसे जीवन

औरत आखिरी बार बुदबुदाती है
क्या अब वह जाए ?
गांवनुमा कस्बे के कोर्ट का बाबू
उदासीन आँखों से
औरत को देखकर भी नहीं देखते हुए कहता है
कह तो दिया
जब खबर आएगी बता देंगे

कचहरी के परिसर में लगे
हरसिंगार के पेड़ों की छायाएं
लम्बी हो गयी हैं
इनपर संभलकर पैर रखते हुए
वह एक तरफ को चल देती हैं

कोर्ट के सामने
अब लगभग सुनसान सड़क के दूसरी ओर
झोपड़ीनुमा दुकान पर बैठा चायवाला
दुकान बढ़ने की सोच रहा है
औरत कुछ सोचती-सी वहां पहुंची
चाय लेकर सुड़कने लगी
बच्ची दुकान पर रखे
बिस्किट के लगभग खाली मर्तबानों को
ललचाई नज़रों से देख रही है
चायवाले ने पूछा
कुछ पता लगा ?
औरत ने उदासीन भाव से
नकारात्मक सर हिलाया

चायवाला मुझे शहरी ओर अजनबी
समझकर बताने लगा
इसके आदमी को चोरी के इल्जाम
में पकड़ा था
जमानतदार न होने से
कई महीनों से जेल में बंद है
रोज उसके छूटने की खबर
पूछने आती है

संवाद के दौरान
औरत चुपचाप खड़ी रही
उसने यह भी नहीं देखा
चायवाला किससे कह रहा है
चाय पीकर धोती की कोर से
पैसे निकाल चायवाले को दिए
थके क़दमों से एक ओर चल दी
बच्ची रोटी हुई पीछे भागी

साफ़ था औरत को मुझमें कोई
दिलचस्पी नहीं है
मैं भी अपनी किसी परेशानी के चलते
यहाँ आया हूँ
मुझे भी उसकी परेशानी में नहीं
उसके जवान औरत होने में ही
कुछ दिलचस्पी है

उसके जाने के बाद
उसे ख्यालों से झटकने के लिए
मैंने सर हिलाया
अदालत की पुरानी मोरचा खाई इमारत
अँधेरे की चादर ओढ़कर
लगभग
अदृश्य हो चुकी थी ।