भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

अधूरा प्रेम / कुंदन सिद्धार्थ

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

एक दिन
मैं नहीं रहूँगा

एक दिन
तुम खो जाओगे

बचा रह जायेगा प्रेम
जो हम कर नहीं पाये

अधूरा छूट गया प्रेम
प्रतीक्षा करेगा पूरे धैर्य के साथ
फिर से हमारे धरती पर लौटने की

अधूरा छूट गया प्रेम
भटकेगा इस सुनसान में
उसकी आत्मा जो अतृप्त रह गयी

मैं आऊँगा रूप बदलकर
तुम भी आना
हम करेंगे प्रेम जी भर के

अधूरा जो छूट जाता है
पीछा करता है जन्मों-जन्मों
तुम्हीं ने कहा था
बरसों पहले