भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
  काव्य मोती
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

अध्याय १२ / भाग २ / श्रीमदभगवदगीता / मृदुल कीर्ति

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज


अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः।
सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान्॥१२- ११॥

असमर्थ यदि व्यवहारं में,
और मर्म लगै कि दुष्कर है,
फल कर्म बिसारि, विजित मन सों,
शरणागत मोरे, सुखकर है

श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानाद्ध्यानं विशिष्यते।
ध्यानात्कर्मफलत्यागस्त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्॥१२- १२॥

बिनु जाने मरम अभ्यास कियौ,
तस ज्ञान सों ज्ञान परोक्ष भल्यो .
मम ध्यान धरै यहि तासों भल्यो.
निष्काम करम, अति श्रेय भल्यो

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।
निर्ममो निरहंकारः समदुःखसुखः क्षमी॥१२- १३॥

जिन द्वेशन स्वारथ हीन भये,
ममता और अहम विहीन भये,
सुख दुखन प्रीति प्रतीति नाहीं,
तिन मोरे ध्यान विलीन भये

संतुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः॥१२- १४॥

मन इन्द्रिन जिन वश माहीं किये ,
संतोष निरंतर ध्यान किये
अर्पित मन बुद्धि समर्पित जो,
वही भक्त मेरौ, मैं ताके हिये

यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः।
हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः॥१२- १५॥

उद्विग्न करै न होय स्वयं,
भय, हर्ष, अमर्ष विहीन जना.
अस भक्त जो सम्यक संयत मैं,
उनकौ, वे मोरे सनेही मना

अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः।
सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः॥१२- १६॥

अति पावन दक्ष , ना चाह हिये
बिलगाय गयौ जिन दुखन सों.
परित्यागी अकर्ता प्रिय मोरे,
लपटात तिन्हें,आपुनि मन सों

यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति।
शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स मे प्रियः॥१२- १७॥

न द्वेष, न हर्ष, न शोच करें,
नाहीं चाह धरें, हिया माहीं कोऊ .
शुभ कर्म अशुभ फल त्याग करैं,
मोहे भक्त, अति प्रिय होत सोऊ

समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः।
शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्गविवर्जितः॥१२- १८॥

सुख दुखन , शीतन तापन में,
अपमान-मान , रिपु -मित्रं में,
सब माहीं रहै सम भावन में,
आसक्ति बिना संसारन में

तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी सन्तुष्टो येन केनचित्।
अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः॥१२- १९॥

सुख माने जेहि विधि कृष्ण धरै
सम निंदा स्तुति माहीं हिया.
ना नेह -निकेत मनन प्रिय जो,
स्थिर मति भक्तन मोह लिया

ये तु धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते।
श्रद्दधाना मत्परमा भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः॥१२- २०॥

जी उक्त धर्म मय अमिय पान,
निष्काम भाव सों पान कियो ,
तस भक्त होत मोहे अतिशय प्रिय ,
मम होत परायण जीत हियो