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अध्याय ७ / भाग १ / श्रीमदभगवदगीता / मृदुल कीर्ति

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श्री भगवानुवाच

मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः।
असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु॥७- १॥

मम पार्थ! परायण तू मोरे,
आसक्त मना, हुइ जा, हुइ जा.
जेहि जानि सकल संशय निःशेष,
तेहि सार-तत्व अर्जुन! सुनि जा

ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः।
यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते॥७- २॥

सुन पार्थ! मर्म की बात गहन,
और ज्ञान कौ तत्व विशेष महे.
जेहि जानि के जाननि कौ जग में,
कछु जाननि जोग न शेष रहे

मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये।
यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः॥७- ३॥

अस सिद्धि की चाह हजारन में,
कोऊ एक मनुज धरि पावत है.
कोऊ एक कदाचित बिरलौ ही,
मोहे तत्व सों जानिबो चाहत है

भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च।
अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा॥७- ४॥

जल, पावक, धरनी, वायु, गगन
मन, बुद्धि, अहम् यहि प्रकृति है.
इन आठन माहीं विभाजित जो ,
संसार मोरी अनुपम कृति है

अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम्।
जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्॥७- ५॥

यहि मोरी जड़ प्रकृति अपरा,
इन आठन मांहीं विभक्त भई ,
और दूजी चेतन जो है परा,
जेहि सों यहि सृष्टि व्यक्त भई,

एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय।
अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा॥७- ६॥

सगरौ जग ही तो परा-अपरा,
इन दोउन प्रकृतिंन सों उपजे,
में मूलहिं कारण सृष्टि कौ,
मोंसों ही प्रलय- सृष्टि सरजे

मत्तः परतरं नान्यत्किंचिदस्ति धनंजय।
मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव॥७- ७॥

हे अर्जुन! मोरे सिवा जग में,
कहूं किंचित कोऊ अस्तित्व नहीं,
माला के सूत्र समान जगत कौ,
धारक मैं अत्युक्ति नहीं

रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः।
प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु॥७- ८॥

हे अर्जुन! जल माहीं रस मैं,
सूरज शशि माहीं प्रकाश मेरौ,
वेदन माहीं ओंकार, गगन
में शब्द पुरुष, पौरुष मेरौ

पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ।
जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु॥७- ९॥

सुन धरा में गंध सुवासित हूँ,
अग्नि में तेज हूँ , प्रानिन में.
मैं शक्ति जीवनी, प्राण सुधा,
और तप हूँ तेज तपस्विन में

बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम्।
बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम्॥७- १०॥

हे अर्जुन! तू सब प्रानिन कौ,
सब मूल सनातन जानि मोहे.
में तेज तपस्विन कौ बिरलौ ,
ज्ञानिन कौ ज्ञान भी जानि मोहे

बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम्।
धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ॥७- ११॥

आसक्ति काम रहित बल जो,
ऐसो बल मैं बलवानन में,
मैं धर्म सों युक्त हूँ काम प्रबल
अस रूप बसत प्रति प्रानिन में

ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये।
मत्त एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि॥७- १२॥

गुण राजस, तामस, सत्व जदपि,
सब मोसों ही तो उपजत हैं.
ना मैं उनमें , ना वे मुझमें ,
नाहीं नैकु तथापि रहवत हैं

त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत्।
मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम्॥७- १३॥

राजस, तामस गुण मन भावन
सों जगत विमोहित है सगरौ.
अति होत परे गुण तीनहूँ सों,
कोऊ तत्व ना जानाति है मेरौ

दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया।
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते॥७- १४॥

यहि अद्भुत दिव्य त्रिगुणी माया,
मोरी योग की माया दुस्तर है.
जो नित्य निरंतर मोहे भजें,
माया सों तरें जो दुष्कर है

न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः।
माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः॥७- १५॥

जिनकौ माया ने ज्ञान हरयो,
आसुरी वृति धारक, अधम नरा.
दुष्कर्मी तामसी मूढ़ जना ने
नैकु न मोरा भजन करा