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अनगिन दीरी / अरुण हरलीवाल

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हरिआइल सपना फुलाइल रे, महकऽ हइ बधार!
डमक-डमक बजऽ हइ मनरवा रे, गावऽ हइ जेवार!

हर-पालो-चउकी रे बड़ही बनइलक, फरवा बनइलक लोहार;
नाधा अउ जोती रे मोची बनइलक, जन-जन कइलक सहकार।
चूलइ पसेनवाँ किसनवाँ के, सपना भेल सकार!
डमक-डमक बजऽ हइ मनरवा रे, गावऽ हइ जेवार!

जन-जन के नेह-देह एक ठइँया मिललइ, बस गेलइ सुन्नर गाम;
जन-जन के हाथ जे सहकार कलइक, दुर्गा हइ ओकर नाम।
अयलइ दसऽहरा के दिनावाँ रे, सजलइ घर-दुआर!
डमक-डमक बजऽ हइ मनरवा रे, गावऽ हइ जेवार!

नीला रँग चद्दर पर सोनऽ कटोरवा, कामऽधेनू के रे दूध;
अमरित चुआवे चान निरमल नभ से, पीअऽ हइ धरती के पूत।
नर-नारी नच-गाके धरती पर देलन सरगे उतार!
डमक-डमक बजऽ हइ मनरवा रे, गावऽ हइ जेवार!

गिरल-पड़ल भितिया के फिर से उठयबइ गोबर से देबइ पँड़ोर;
लछमी के अगुआनी खातिर बिछयबइ नयना अपन चहुँ ओर।
डमक-डमक बजऽ हइ मररवा रे, गावऽ हइ जेवार!