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अनजाने पथ पर जब साथी कोई मिलता है / अमरेन्द्र

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अनजाने पथ पर जब साथी कोई मिलता है
आँखों में एक नया इन्द्रधनुष खिलता है।

नियमों-अनुशासन का टूट जाए पद्मासन
मेरू-सा प्राणों पर रहता क्या तब शासन
और वही पत्थर मन मोम-सा पिघलता है।

कल तक जो लगता था अच्छा अकेलापन
लगने वह लगता है, वह तो था पागलपन
किससे तब चंचल मन सँभले सँभलता है।

मेघों की छाया में घोर अटट योगी मन
लिखता है मुरली के छन्द ही वियोगी मन
अनहद के बदले सुर पंचम निकलता है।