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अन्दर ही अन्दर / कुमार कृष्ण

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क्या तुमने सोचा है कभी-
शब्द में कहाँ छुपी होती है कविता
कहाँ छुपे होते हैं मनुष्य
कहाँ छुपा होता है महाकाव्य
कहाँ छुपी होती हैं कहानियाँ
कहाँ छुपे होते हैं तारों में राग
कहाँ छुपी होती है लोहे में आग

क्या तुमने सोचा है कभी-
कहाँ छुपा होता है फूलों में लिबास
घंटी में विश्वास
बांसुरी में गीत
आंखों में प्रीत
चाकू में डर
मिट्टी में घर
आखिर कहाँ छुपे होते हैं ये सब

छुपा होता है सभी कुछ अन्दर ही अन्दर
जैसे छुपे होते हैं सपनें
छुपी होती है उम्मीद
छुपा होता है विश्वास
छुपी होती है मरते समय भी
प्राणों में जीने की आस।