भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

अन्धकार की खोल / देवेन्द्र कुमार

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

लो दिन बड़ा हुआ
अन्धकार की खोल फेंककर
सूरज खड़ा हुआ ।

खुलने लगीं दिशाएँ मन में
दूर कहीं आँखों के वन में
आसमान नंगी बाँहों पर
लगता अड़ा हुआ ।

देखो तो इस शाम को भला
अपने में खोई शकुन्तला
आधा-धड़ बाहर, आधा-
ज़मीन में गड़ा हुआ ।

नदी, पहाड़, वनस्पतियाँ हैं
बिस्तर-बन्द मनःस्थितियाँ हैं
नर्म हथेली पर
सब-कुछ
सरसों-सा पड़ा हुआ ।