भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

अन्धकार / बसन्तजीत सिंह हरचंद

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

अन्धकार है
अन्धकार है
अन्धकार ही अन्धकार है १

अन्धकार के पीछे - पीछे
एक भयंकर सन्नाटा - सा ,

चला आ रहा अपना शीश झुकाए नीचे ;
आँख उठाकर तो देखो तुम ।

घरों को , गाँवों को , नगरों को
वनों को और पर्वतों के शिखरों को ,
प्रतिपल घूम रही पृथ्वी को,
महाकाश के ज्ञान नेत्र को अंधा करके ;
अवसर पाकर निगल रहा सब अन्धकार है ।

इस मरघट के अन्धकार में ----
कुछ चिंता की लपटों पर अध - झुलस नाचते हैं शव ,
कुछ अध - मरी हुई लाशों को भूख नोचती बेढब ।
तीखी दाढ़ों वाले जबड़ों में दु;ख
अपनी - अपनी ओर खींचते कंगालों के कंकालों को १
निर्धनता मुंह फाड़े
झपट रही है व्याकुल होकर ,
सहज संतुलन सब खो - खोकर
लथपथ है इंसान ।

है कब का मर चुका सत्यवादी प्रहरी वह ?
नहीं जलाने दिया पुत्र के शव को जिसने ;
पर अब जिसने पहरा देना सम्भाला है
अपनी लाश जलाना चाहता बिना मोल के ।

देख - देख अंधेर अँधेरे में मत रोवो
कोई भी तो देख नहीं पायेगा ,
लुढका आंसू व्यर्थ चला जाएगा ।

यह घुसपेठिया अन्धकार
गली में , आँगन में , घर में
और हमारे बुझे हुए आन्तर में ,
बिना किसी आहट के
घुस आया है ।।

(अग्निजा , १९७८)