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अन्याय के विरुद्ध / असंग घोष

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जब भी कभी
उठकर खड़ी होती हूँ
अन्याय के विरुद्ध
तुम्हारे ख़िलाफ़
तो—
मुझे ही घुमाया जाता है निर्वस्त्र
देखने को गुप्तांग
तुम्हारी ही माँ-बहनों सदृश्य

बुझाना चाहते हो
अपनी कुंठाओं की हवस
ढलकर / जात्याभिमान के साँचे में
लेकिन
नहीं बेचती मैं / अपनी नारी-धर्मिता को
तुम जैसे भेड़ियों / दरिन्दों के हाथ
एक तरफ़ / तुम्हारी ही
माँ-बहन और बेटियाँ
उर्वशी और अप्सरा बन / करती हैं नृत्य
फाइव-स्टार होटलों में
बन के कालगर्ल और कैबरे डांसर
करने को धनोपार्जन—
इस सभ्यता की लँगड़ी दौड़ में / वह—
पाश्चात्य सभ्यता की प्रतीक है
जो मारती है तमाचा
तुम्हारी 'सभ्यता के गाल पर'
पूछना चाहती हूँ
तुम्हीं से एक सवाल— चरित्रवान कौन?
मैं या कि वो?