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अन्योक्ति से उपदेश / नाथूराम शर्मा 'शंकर'

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सजले साज सजीले सजनी,
मान विसार मनाले वर को।
गौरव-अंगराग मलवाले, मेल-मिलाप तेल डलवाले,
न्हाले शुद्ध सुशील-सलिल से, काढ़ कुमति-मैली चादर को।
ओढ़ सुमति की उज्ज्वल सारी, सद्गुण-भूषण धार दुलारी,
सीस गुँदाय नीति-नाइन से, कर टीका करुणा-केसर को।
आदर-अंजन आँज नबेली, खाकर प्रेम-पान अलबेली,
धार प्रसिद्ध सुयश की शोभा, दमकाले आनन सुन्दर को।
मेरी बात मान अवसर है, यौवन-काल बीतने पर है,
तू यदि अब न रिझावेगी तो, फिर न सुहावेगी ‘शंकर’ को।