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अपना घर क किस्सा / विनय राय ‘बबुरंग’

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आहि हो दादा!
का बतलाईं हम
अपना घर क किस्सा?

घर से बाहर
जे भी गइल
कमाये-धमाये खातिर
सहर-सहरातन में
कमाई दिहल त दूर
खाली उनके लउकेला
घर क आपन हिस्सा।
आहि हो दादा!
का बतलाईं हम
अपना घर क किस्सा?
मनीआडर क गइल जमाना
अब अपना नावे
हो जाला फिक्स
नाती पढ़े अंग्रेजी स्कूल में
फोर फाइव सिक्स
जहवां दस गुना
लागेला फीस
देखेलन रंगीन टीवी
लगा एन्टिना डिस
देखा देखी नकल
आजु होत बा
घर-घर में फालतू खर्च पर
दबावल जात बा स्विच
एहर माई आ बाबू क
हालत बा कइसन-
टांय-टांय फिस,
सोसाइटी क बकाया वा
कइसे दियाई किस्त
इहे बा कारन कि
टूट गइल कमर
जियल भइल समर
फंस गइल नइया आके बिच भंवर
अउरी ना त
टूट रहल अपनन से
खानदानी अब रिस्ता
आहि हो दादा!
का बतलाईं हम
अपना घर क किस्सा?
कमाई दिहल त दूर
खाली उनके लउकेला
अपना घर क हिस्सा।
जबले तब बबुआ
कुंवार रहलन
पढ़ि लिख के
बेरोजगार रहलन
दउर दउर के
अपना माई बाबू क
सेवा पर सेवा कइलन
जब उनकर बियाह हो गइल
त अइसन खँटा में
बन्हा गइलन कि
अपना में अझुरा गइलन
आ नौकरी मिलत क हऽ
कि
चटपट परिवार ले के
सहर सहरात धइलन
उहां नोकरी क
संगे-संगे
एक से एक
नसा धरा गइल
तब से उनका बुद्धि में
करमनासा क पानी
भरा गइल
इहे कुल कारन से
जियते जिनिगी
माई आ बाबू क
दूरदसा हो गइल
कुल पढ़ावल-लिखावल
डाड़ हो गइल
बबुआ सहर में जाके
भांड हो गइल,
आंवऽ जब-जब घरे त
खाली उनके लउकेला
केतना पैदा भइल अनाज
केतना नाहीं
केतना खरच बा घर में
एकरा के
पूछँऽ तक नाहीं
खाली इहे बा
उनके हाही समाइल
कब नावे हो जाइत
ई बिगहा मंडा बिस्सा
आहि हो दादा!
का बतलाईं हम
अपना घर क किस्सा?
कमाई दिहल त दूर
खाली उनके लउकेला
घर क आपन हिस्सा।
पहिले क नोकरीहन में
घर से प्रेम रहल करे
भाव भरल दिल में
सभका प्रति
सनेह रहल करे
बाहर से एतना समान
कमा के ले आवे लोग भरपूर
कि
समान ले आवे बदे
भेंजल जा
दू-चार गो मजूर
पहिले आ आजू क
नोकरीहन में
केतना बा अन्तर
कि
आंगन में अवते
उठा देलन बवण्डर
हमरा नाहीं बुझाला
कि
कवनो कमासुत आइल है
कि
घर में बन्दर
कबहूँ घर ले बाहर
त कबहूँ बाहर ले अन्दर
आवंऽ त खाली

अटैची लेके आवंऽ
खाली ओमे आपन
कपड़ा-लत्ता लुंगी-गंजी
लेके आवंऽ
आपन चेहरा सजावे खातिर
ऐना-कंघी-रेजर
आ पाउडर लेके आवंऽ
फिर गांव में
घूमि-घूमि के
दुआरे-दुआरे
बड़की-बड़की
आदर्स क बात बतियावंऽ
फिर जाये के बेरी
बाभन गठरी नीयर
बावन गो गठरी गठियावंऽ
गनीमत एतने रहे
कि
सहरन में गैस चूल्हा क चलते
घर से गोइठां ना गठियावंऽ
जवन चाहंस ले जांस
घर से उठा के उ
अइसन लगवले बानऽ
घर में मीसा
आहि हो दादा!
का बतलाईं हम
अपना घर क किस्सा?
कमाई दिहल त दूर
खाली उनके लउकेला
घर क आपन हिस्सा।

अइसन बेटा अन्त में
भले बंाधी घंट
बाकी जिनिगी भर
बेटा कहाई
रहे बड़का लंठ
फिर कहीं बइठ के
कोना-कन्हारी में
बबुआ जी रोइहें-गिड़गिड़इहें
हे भगवान!
हम कहवां से
कहवां बहि गइलीं
जवले सहर में
कमाये धमाये गइलीं
समाज क संस्कार भुला के
घर ही में
आपन चारू धाम भुला के
अपना माई बाबू क सेवा से
वंचित रहि गइलीं
माफ करऽ
हे भगवान, माफ करऽ
भगवान से हाथ जोड़ि के
मंगिहें तब भिक्षा।
आहि हो दादा!
का बतलाईं हम
अपना घर क किस्सा?
कमाई दिहल त दूर
खाली उनके लउकेला
घर क आपन हिस्सा।।