भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

अपनी बे-चेहरगी में पत्थर था / 'रसा' चुग़ताई

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

अपनी बे-चेहरगी में पत्थर था
आईना बख़्त में समंदर था

सर-गुजिश्‍त-ए-हवा में लिखा है
आसमाँ रेत का समंदर था

किस की तसनीफ़ है किताब-ए-दिल
कौन तालीफ़ पर मुक़र्रर था

कुछ तो वाज़ेह न था तिरी सूरत
और कुई आईना मुकद्दर था

वो नज़र ख़िज्र-ए-राह मक़तल थी
उस से आगे मिरा मुक़द्दर था

रात आग़ोश-ए-दीदा-ए-तर में
अक्स-ए-आग़ोश-ए-दीदा-ए-तर था

ये क़दम इस गली के लगते हैं
जिस गली में कभी मिरा घर था