भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

अपने पथ पर चलना / रमेश रंजक

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

चलने की खा कर सौ कसमें
पंथी हार न जाना पथ में।

तेरी ही थकान जब तुझ से
तीखा वाद-विवाद करेगी
एक गुनगुनी सिहरन तेरे
तन-मन को फौलाद करेगी

पानीदार आग होती है
पथ के दावेदार शपथ में।

अन्तर की चिनगारी का तू
जिस दिन कर देगा अनुमोदन
जाने कितने रूप बदल कर
आएँगे हर बार प्रलोभन

फिर भी अपने पथ पर चलना
मत चढ़ना चाँदी के रथ में।