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अपने से / नरेन्द्र शर्मा

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तोड़ फेंक पतवार रे!
अपना नहीं कहीं कोई, अपनी जीवन-मझधार रे!

लहरें तेरी बाँह गहेंगीं, सब दिन तेरे संग रहेंगीं,
मिला बोल से बोल बहे तू, ये लहरें जिस ओर बहेंगीं;
हाथ उठा कर साथ, गगन के स्वामी को ललकार रे!

निगल गई पच्छिम में रवि को नागिन-सी यह साथिन तेरी,
उगल रहीं फुफकार मार कर भर भादों की रैन अँधेरी;
छिटक गए हैं झाग, दीखते जो तारे दो चार रे!

देखा तट तटनी का मिलना; रोना क्या जो साथ छूटता?
देख कगारों का भी गिरना; रोना क्या जो हृदय टूटता?
सह प्रहार, पर गिर कगार-सा मत कर हाहाकार रे!

उसका सोच फ़िकर करना क्या, अपने बस की बात नहीं जो!
एक आस ही पास रही, ये ले जाएँगी बहा कहीं तो!
बहने में भी सुविधा होगी, नहीं कहीं आधार रे!

तुझको कहाँ पड़ी पल भर कल; चाहा बहुत बुद्धि ने छलना!
तू अपना भी भला न कर सका; व्यर्थ हुआ बच बच कर चलना!
अब तो प्रलय-पूर में चाहे जितने पाँव पसार रे!
तोड़ फेंक पतवार रे!