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अप्प दीपो भव / परिनिर्वाण / कुमार रवींद्र

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और...
बुद्ध हुए मौन
और साथ मौन हुईं सारी जिज्ञासाएँ

अँधियारे छँटे सभी
कौंधा था एक ज्योतिपुंज
सौरमण्डल में
इन्द्रधनुष की आभा
उतर आई थी जैसे
झील-ताल के जल में

सतरंगी
सपनों से
आलोकित हुईं सभी संध्याएँ

चिता सजी
चक्रवर्ति राजा के जैसी
भस्मि हुई सिर्फ़ देह
व्याप गयी शास्ता की
घर-घर वाणी विदेह

अस्थिकलश
सजे आठ
बिखर गईं सभी ओर करुणा की आस्थाएँ