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अप्प दीपो भव / बिम्बसार 2 / कुमार रवींद्र

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भीतर
इक दीप जला
चकित हुए बिम्बसार

बाहर है घना धुंध
मन में है जोत भरी
मणि जैसे कोई है
चौखट के पार धरी

बन्दीगृह
नहीं रहा -
भीतर जब खुले द्वार

राजपाट मिथ्या सब हुए
उसी पल भर में
बही काठ हुई देह
करुणा के निर्झर में

हलके
बिल्वपत्र हुए
साँसों के सभी भार

पोखर थे वे छिछले
अब गहरे सागर हैं
नेह की नदी में वे
तैरते दुआघर हैं

बिला गईं
इच्छाएँ
मिटे सभी अहंकार