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अफ़्कार तो आए हैं उम्मीद भी आ पहुँचे / रवि सिन्हा

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अफ़्कार[1] तो आए हैं उम्मीद भी आ पहुँचे
ये मर्ज़ हक़ीक़त का ख़्वाबों की दवा पहुँचे

क्यूँ हब्स[2] फ़ज़ा[3] में है तारीख़ से बू आए
इमरोज़[4] की साँसों को फ़र्दा[5] की सबा[6] पहुँचे

बीनिश[7] के दरीचे[8] से माज़ी[9] ही नज़र आए
भटके है वहाँ कोई उस तक तो सदा[10] पहुँचे

हर बूद[11] में ज़र्रे में होने से तो क्या होगा
जो रोज़ पुकारे है उस तक तो ख़ुदा पहुँचे

लाए के न कुछ लाए ये सुब्ह तो आ जाए
ख़बरें हों भले बासी अख़बार नया पहुँचे

शब्दार्थ
  1. सोच, चिन्ताएँ (thoughts, worries)
  2. घुटन (suffocation)
  3. वातावरण (atmosphere)
  4. आज का दिन (today)
  5. आने वाला कल (tomorrow)
  6. बयार (wind)
  7. दृष्टि, अन्तर्दृष्टि, विवेक (insight, wisdom)
  8. खिड़की (window)
  9. अतीत (past)
  10. पुकार (call)
  11. अस्तित्व (existence)