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अबू लहब की शादी / नून मीम राशिद

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शब-ए-शफ़ाफ़-ए-अबू-लहब थी मगर ख़ुदा या वो कैसी शब थी
अबू-लहब की दुल्हन जब आई तो सर पे ईंधन गले में
साँपों के हार लाई न उस मो मश्‍शात्गी से मतलब
न माँग ग़ाज़ा न रंग रोग़न गले में साँपों
के हार उस के तो सर पे ईंधन !
ख़ुदा या कैसी शब-ए-शफ़ाफ़-ए-अबू-लहब थी !

ये देखते ही हुजूम बिफरा भड़क उठे गज़ब
कि शोले के जैसे नंगे बदन ये जाबिर के ताज़ियाने !
जवाल लड़कों की तालियाँ थी न सेहन में शोख़
लड़कियों के थिरकते पाँव थिरक रहे थे
न नग़मा बाक़ी न शादियाने !

अबू-लहब ने ये रंग देखा लगाम थामी लगाई
महमेज़ अबू-लहब की ख़बर न आई !

अबू-लहब की ख़बर जो आई तो सालहा-साल का ज़माना
ग़ुबार बन कर बिखर चुका था !

अबू-लहब अजनबी ज़मीनों के लाल-ओ गौहर समेट कर
फिर वतन को लौट हज़ार तर्रार ओ तेज़ आँखें पुराने
ग़ुर्फों से झाँक उट्ठीं हुजूम पीर ओ जवाँ का
गहरा हुजूम अपने घरों से निकला अबू-लहब के जुलूस
को देखने को लपका !
अबू-लहब ! इक शक-ए-शफ़ाफ़-ए-अबू-लहब का जला
फफूला ख़याल की रेत का बगूला वो इश्‍क़-ए-बर्बाद
का हेयूला हुजूम में से पुकार उट्ठी अबू-लहब !

तू वही है जिस की दुल्हन जब आई तो सर पे ईंधन
गले में साँपों के हार लाई ?
अबू-लहब इक लम्हा ठिठका लगाम थामी लगी
महमेज़ अबू-लहब की ख़बर न आई