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अब उस फ़लक पे चान्द सजाता है कोई और / रवि सिन्हा

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अब उस फ़लक[1] पे चान्द सजाता है कोई और
उनके शहर के नाज़ उठाता है कोई और

रुख़्सत हुए कहीं से बुलाता है कोई और
गो आगही[2] के छोर से आता है कोई और

हमने सहर[3] से बस उफ़क़[4] को सुर्ख़-लब किया
शोला ये तुन्द[5] सर पे चढ़ाता है कोई और

इस रिज़्क़[6] से रिहा तो हुए मुद्दतों के बाद
पतझड़ में फूल आज खिलाता है कोई और

इक भीड़ सी मची है मिरे क़स्रे-हाफ़िज़ा[7]
आवाज़ दूँ किसी को तो आता है कोई और

क़ाबू में है शुऊर[8] तो तहतुश-शुऊर[9] से
वहशत[10] की फ़स्ल अब वो उगाता है कोई और

रहबर वो जब थे राह थी सीधी सी इक लकीर
तारीख़ को अब राह दिखाता है कोई और

है ज़ेरे-पा[11] ये ख़ल्क़[12] तो तसख़ीर[13] के लिए
आलम[14] ख़ला[15] में अब वो बनाता है कोई और

वो रौशनी के बुर्ज हुए ग़र्क़े-बह्रे-ख़ल्क़[16]
साहिल[17] पे इक मशाल जलाता है कोई और

शब्दार्थ
  1. आसमान (Sky)
  2. चेतना (awareness)
  3. सुबह (morning)
  4. क्षितिज (horizon)
  5. प्रचण्ड (blazing)
  6. जीविका (livelihood)
  7. स्मृतियों का भवन (castle of memories)
  8. चेतना (consciousness)
  9. अवचेतन (the subconscious)
  10. पागलपन (frenzy)
  11. पैर के नीचे (under the foot)
  12. लोग, मानव जाति (people, mankind)
  13. वशीभूत करना (subjugation)
  14. दुनिया (the world)
  15. अन्तरिक्ष (space, vacuum)
  16. अवाम के समुन्दर में डूब गए (drowned in the ocean of people)
  17. समुद्रतट (shore)