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अब क्या कोई सुने कि कहो क्या कोई कहे / रवि सिन्हा

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अब क्या कोई सुने कि कहो क्या कोई कहे
बेगानगी का शहर मुझे अजनबी कहे

शोरिश[1] क़रार ख़ार[2] के गुल क्या ख़िज़ाँ[3] बहार
जो ग़र्क़े-ज़िन्दगी[4] है तमाशा वही कहे

क़ुदरत के क़ायदे खुले असरार[5] भी खुले
इल्मो-ख़िरद[6] से अब तो कहो आदमी कहे

जब होशो-चश्मो[7]-गोश[8] रिफ़ाक़त[9] में साथ हों
हुस्ने-ख़याल को ही अदब बन्दगी कहे

माना सुख़न शरीके-दहर[10] ख़ल्क़[11] की ज़ुबान
शायर कभी कभार तो दिल की लगी कहे

बारिश हुई है उस पे, समन्दर को देखिए
बिजली गिरी है जिस पे उसे क्या कोई कहे

मक़्ता[12] कहे बग़ैर ही शायर चला गया
अब तुम कहो वो शे'र जिसे ज़िन्दगी कहे

शब्दार्थ
  1. हंगामा (tumult)
  2. काँटे (thorns)
  3. पतझड़ (autumn)
  4. जीवन में निमग्न (immersed in life)
  5. मर्म (secrets)
  6. ज्ञान और बुद्धि (knowledge and intelligence)
  7. आँख (eye)
  8. कान (ear)
  9. साहचर्य (companionship)
  10. युग (era)
  11. लोग (people)
  12. ग़ज़ल का आख़िरी शे'र(last she’r of the Ghazal)