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अब क्या बताएँ टूटे हैं कितने कहाँ से हम / राजेश रेड्डी

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अब क्या बताएँ टूटे हैं कितने कहाँ से हम
ख़ुद को समेटते हैं यहाँ से वहाँ से हम

क्या जाने किस जहाँ में मिलेगा हमें सुकून
नाराज़ हैं ज़मीं से ख़फ़ा आसमाँ से हम

अब तो सराब[1] ही से बुझाने लगे हैं प्यास
लेने लगें हैं काम यक़ीं का गुमाँ[2] से हम

लेकिन हमारी आँखों ने कुछ और कह दिया
कुछ और कहते रह गए अपनी ज़बाँ से हम

आईने से उलझता है जब भी हमारा अक्स
हट जाते हैं बचा के नज़र दरमियाँ से हम

मिलते नहीं हैं अपनी कहानी में हम कहीं
गायब हुए हैं जब से तेरी दास्ताँ से हम

क्या जाने किस निशाने पे जाकर लगेंगे कब
छोड़े तो जा चुके हैं किसी के कमां से हम

ग़म बिक रहे थे मेले में ख़ुशियों के नाम पर
मायूस होक लौटे हैं हर इक दुकाँ से हम

कुछ रोज़ मंज़रों से जब उट्ठा नहीं धुआं
गुज़रे हैं सांस रोक के अम्न-ओ-अमां से हम

शब्दार्थ
  1. मृगतृष्णा
  2. वहम