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अब भी चेतो मन मेरा / जनार्दन राय

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अब भी चेतो मन मेरा।
रात-दिन तुम देख रहे हो,
दुनियां की निर्ममता।
फिर भी कैसे तुम कहते हो,
मैं तेरा तू मेरा।
अब भी चेतो मन मेरा।

सुन्दर जीवन बीत रहा है,
मिथ्या सुख पाने में।
लोभ, मोह, माया ने डाला,
तन में आकर डेरा।
अब भी चेतो मन मेरा।

बीता जीवन अधिक तुम्हारा,
रहा शेष अब थोड़ा।
अब भी तो कुछ अर्जन कर ले,
जब तक जग में डेरा।
अब भी चेतो मन मेरा।

जिसे समझते हो तुम अपना,
कोई नहीं तुम्हारा।
अन्तिम क्षण जब आ जायेगा
होगा नहीं बसेरा।
अब भी चेतो मन मेरा।

मान, गुमान तजो सब अपना,
करो धर्म जीवन में।
श्रम-सेवा दो दान जगत को,
कहो बन्धु सब मेरा।
अब भी चेतो मन मेरा।

भोग-वासना से मुख मोड़ो,
भक्ति-भाव अपनाओ।
रात मोह की बीत रही है,
होगा तुरत सवेरा।
अब भी चेतो मन मेरा।

नहीं यहां कुछ लेकर आये,
जाना होगा यों ही।
फिर भी हाय-हाय क्यों करते,
कौन यहां है तेरा?
अब भी चेतो मन मेरा।

जग से नाता जोड़-जोड़ कर,
प्रेम-भाव दिखलाया।
अपने और पराये में ही
तत्व नहीं कुछ हेरा।
अब भी चेतो मन मेरा।

द्वेष-कलह को त्याग-त्याग कर
जीवन धन्य बनाओ।
काम, क्रोध, मद, मोह जीत लो
भाग्य-चक्र का फेरा।
अब भी चेतो मन मेरा।

-दिघवारा,
22.10.1955 ई.