अभिशप्त / संगीता गुप्ता


बिलबिलाती भूखों के बीच
कोई सुरक्षित नहीं
भरोसा नहीं किसी का
चौदह साल की मासूम उम्र
मित्रों द्वारा अपहृत और फिर
मौत के घाट उतारा जाना
बच्चे कहां जायें,
किसके साथ खेलें
यह कैसे
युग, काल में
जी रहे हैं हम

छः बरस की बच्ची हो या
अस्सी की
स्त्री मादा है बस
कोई भी नर
कभी भी भूखा
सिर्फ भूखा हो जाता है
नहीं रहता बाप, भाई, बेटा या दोस्त
यह कैसे
युग, काल में
जी रहे हैं हम
अंतहीन भूख
और अशेष वासनाओं, लिप्साओं ने
लील लिया
वह सब जो सत्य था,
शिव था, सून्दर था

आदमखोरों के गिरोह ने
लूट ली हमारे
विवेक की धरोहर
सोख लिया हमारी
आस्थाओं का सागर
कुछ भी तो नहीं बचा
हमारे पास
सब कुछ देख रहे हम,
फिर भी
जुबान नहीं खुलती
इस कदर
दहशत से सिले हैं
हमारे ओंठ
कुछ कर नहीं सकते
इस तरह बंधे हैं
खौफ की रस्सियों से पैर
हर पल मरते हुए
एक पूरे दौर को देखना, उफ
यह कैसे
युग, काल में
जीने को विवश
अभिशप्त हम

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