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अमुआ के मांजर से फागुन के नेवता / शेष आनन्द मधुकर

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अमुआ के मांजर से फागुन के नेवता,
भेजऽ हइ सगरो बयार।

अल्हड़ चननिया के गवना के डोली,
ढोये तरेगन कहार।

महुआ के मह-मह-मह-महकइत कँउची,
टपकऽ हइ जइसे कि लोर।
गेहुम के बलिया से रूसल पवनमा,
धयले हे तीसी के गोड़।

झूम-झूम फहरऽ हइ धानी चुनरिया,
सौतिन के टूटल नेयार।

ओने कचनार खड़ा छिमिया के देखइ,
हरियर लुग्गा के रंग।
एने कोइलिया भिनुसहरे से कुहकइ,
अप्पन मरदवा के संग।

हमरे अंगनमा अमावस के करिखा,
सबके चननिया के हार।

देहिया रंगा हइ पर मनवाँ उदासे हइ,
कइसन ई फगुआ के रीत।
घायल करेज हे, तइयो ढोलकिया पर,
निकलऽ हइ होठवा से गीत।

सब्भे हे ओइसने, गगनवाँ, चनरमा,
उजड़ल हे मन के बधार।