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अमुनी काटिये बेटी, लाब बनाइअ / अंगिका लोकगीत

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   ♦   रचनाकार: अज्ञात

प्रस्तुत गीत में बेटी को भारतीय नारी के उपयुक्त उत्कृष्ट शिक्षा दी गईहै। संध्या समय दीपक जलाकर घरों में दिखलाने और देवता के नजदीक रखने, प्रातः उठकर आँगन बुहारने, भोजन को ढककर रखने, अतिथियों के आने पर उनका सत्कार कर भोजन कराने, सास-ननद की बातों का उत्तर न देने तथा अच्छी तरह ससुराल में रहने का निर्देश किया गया है। कुशल गृहिणी में इन गुणों का होना अत्यंत आवश्यक है।

अमुनी[1] काटिये[2] बेटी, लाब[3] बनाइअ[4]
जाबुनी[5]काटियें बेटी, पतुआर[6] बनाइअ॥1॥
साँझ के बेरी[7] बेटी, साँझअ जोगाइअ[8]
अति रे परातअ[9] बेटी ऐंगना[10] बहारिअ॥2॥
नीके सूखे बेटी, ससुरा बसिहऽ।
ढानल[11] भात बेटी, झापना[12] दिहऽ।
दसो एतअ[13] बेटी, दसो जमइअ[14]॥3॥
सास बचन बेटी, उतरो ना दिहऽ।
ननदी बचन बेटी, उतरो ना दिहऽ॥4॥

शब्दार्थ
  1. आम का पेड़
  2. काटकर
  3. नाव
  4. बनवाना
  5. जामुन का पेड़
  6. पतवार
  7. समय
  8. साझअ जोगाइअ= सांध्यदीप जलाना तथा सभी घरों में दिखलाना
  9. प्रातः
  10. आँगन
  11. राँधा हुआ; पकाया हुआ
  12. ढक्कन
  13. आये; आयगा
  14. खाना खिलाना