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अमृत नहीं पिया / एक बूँद हम / मनोज जैन 'मधुर'

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पाती जब-जब मिली मौत की
रोया बहुत हिया
जीवन को जैसे जीना था
वैसा नहीं जिया

दया धरम का लगा मुखौटा
धोता रहा नमक से छाले
अभिनय करता रहा राम का
रावण को अंतर में पाले
लोभ साधु बन सदा शांति की
हरता रहा सिया

विषय वासना का मद पीकर
कौन समय को फिर पहचाने
आये तो थे कबिरा जोगी
झूठ सॉंच का भेद बताने
ज्ञान और दुनियादारी में
अन्तर नहीं किया

धर्म अॅंजुरी में भर अमृत
जब-जब हमें पिलाने आया
पाप बैरियों के मन में था
फूटी आँख न तनिक सुहाया
पीते रहे गरल भोगों को
अमृत नहीं पिया

हॅंसे अमावस अन्तर्मन की
बाहर जब भी मने दीवाली
भरे उजाले हमने जग में
मन के छोड़े कोने खाली
देख ढल चुका देैहिक सूरज
मन का जला दिया

न्याय तुला पर
शोक सभा का है आयोजन
सब कहते, हम बोलेंगे

आँखों में घड़ियाली आँसू
कोयल-सी तानें बोली में
दिखे आचरण मर्यादा में
घातें ही घातें झोली में
हवा जिधर बहकर जायेगी
हम भी उसके संग हो लेंगे

ऊपर शहद चढ़ा कर सबने
भीतर से कड़वाहट बाँटी
जिससे जितनी बनी जनम भर
उतनी बढ़-चढ़ कर जड़ काटी
चाम सरीखे मढ़े ढ़ोल पर
पोल नहीं अपनी खोलेंगे
जीवन को शर्तों में बाँधा
मरने पर सौंपेंगे अम्बर
वकुल वृत्ति को ढॉंके तन में
दीख रहे हैं सब पैगम्बर
न्याय-तुला पर निजता अपनी
कभी नहीं हरगिज तौलेंगे