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अम्बर पर कोई रोता है / रामकृपाल गुप्ता

अम्बर पर कोई रोता है
संध्या की लाली बुझती है राका राकेश विहँसते हैं
सोने को जाती है जगती सोने के सपने चलते है
अन्तर में होता कोलाहल वीणा के तार सिसकते हैं
आँसू की बूँदें जम जातीं मोती बन किस पर हँसते हैं
उच्छवासों की झंझा से फिर नभ में बिखराते जाते हैं
अलसायी दुनिया कहती है वे तारे क्या-क्या गातेहैं
हाय किसी के आँसू पर ये बेबस नर्तन होता है
अम्बर पर कोई रोता है
जम जाता आँखों का पानी क्रन्दन भी परवश होता है
जलती होली अरमानों की
क्यों भाग्य किसी का सोता है!
उषा धीरे से मुसुकाती करती है किरणों से खेला
दो सूखे निर्झर चल पड़ते आता है पानी का रेला
तारे गलते हैं आहों से नीलम का सिन्धु चमकता है
यह बाढ़ किसी के दुःखों की सारा जग उठकर हँसता है
ओसों की बूँदें चमकती हैं पर इनको कौन पिरोता है
अम्बर पर कोई रोता है