भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
  रंगोली
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार
Roman

अम्मू ने फिर छक्का मारा / प्रभुदयाल श्रीवास्तव

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

गेंद गई बाहर दोबारा,
अम्मू ने फिर छक्का मारा।

गेंद आ गई टप्पा खाई।
अम्मू ने की खूब धुनाई।
कभी गेंद को सिर पर झेला,
कभी गेंद की करी ठुकाई।
गूंजा रण ताली से सारा।
अम्मू ने फिर छक्का मारा।

कभी गेंद आती गुगली है।
धरती से करती चुगली है।
कभी बाउंसर सिर के ऊपर,
बल्ले से बाहर निकली है।
अम्मू को ना हुआ गवारा।
अम्मू ने फिर छक्का मारा।

साहस में न कोई कमी है।
सांस पेट तक हुई थमी है।
जैसे मछली हो अर्जुन की,
दृष्टि वहीं पर हुई जमी है।
मिली गेंद तो फिर दे मारा।
अम्मू ने फिर छक्का मारा।

कभी गेंद नीची हो जाए।
या आकर सिर पर भन्नाए।
नहीं गेंद में है दम इतना,
अम्मू को चकमा दे जाए।
चूर हुआ बल्ला बेचारा।
अम्मू ने जब छक्का मारा।

सौ रन कभी बना लेते हैं।
दो सौ तक पहुँचा देते हैं।
कभी कभी तो बाज़ीगर से,
तिहरा शतक लगा देते हैं।
अपने सिर का बोझ उतारा।
अम्मू ने फिर छक्का मारा।