भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

अरुणोदय होगा / कविता भट्ट

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

उसने कुटिल मुस्कान के साथ कहा,
मैं तो राहु हूँ- तुम्हें ग्रास बना लूँगा।
मैंने मंद मुस्कान सहित निर्भीक कहा-
मैं तो सूरज हूँ - कालिमा निगलता हूँ ।

तनिक सोच- भौहें नचाकर उसने कहा,
केतु हूँ मैं- तुम्हारा तेज तो हर ही लूँगा।
मैं चंदा हूँ - मैंने प्रसन्न मुद्रा में कहा,
कलाओं में निपुण- उगता चलता हूँ ।

नए रूप धर, धमकाता वह आजकल
और मैं उन्मुक्त, उषा के अंक में पड़ा हूँ ।
अब अरुणोदय होगा - कुछ क्षणों में ही
मेरे साथ समग्र विश्व हँसेगा- उसे हराकर।