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अरे! तू काहे होत अधीर / स्वामी सनातनदेव

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राग शिवरंजनी, तीन ताल 18.6.1974

अरे! तू काहे होत अधीर?
हैं तेरे रखवारे प्यारे नन्द-नँदन बल-वीर॥
हैं कालहुँ के काल कृपानिधि, हरहिं भगत की भीर।
इनकी ओट गही तो करिहै कहा काल को तीर॥1॥
जो वे करहिं वही मंगल है, प्यार होउ वा पीर।
होत दोउ विधि कृपासिन्धु की करुना ही अकसीर[1]॥2॥
चरन-सरन जब मिली स्याम की मिल्यौ भवोदधि-तीर[2]
कहा चलै जम के गम की फिर रुचत न सुरग-समीर॥3॥
जाने सरन गही माधव की वही वीर मति-धीर।
भोग रोग सम लगहिं ताहि, तहँ चलत न मन्मथ तीर[3]॥4॥
होत अपावन हूँ जग-पावन, बालहुँ गुरु-गम्भीर।
कहा कहें महिमा वाकी जो अपनायेहु यंदु-वीर॥5॥
रह्यौ न अब साधन-बाधन कछु, रहु निचिन्त मति-धीर।
आपुहि सकल सँभार करहिगे व्रजवासिन के वीर॥6॥

शब्दार्थ
  1. उपयोगी
  2. तीर
  3. वाण