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अल्लाह की रहमत के अंदाज़ निराले हैं / रंजना वर्मा

अल्लाह की रहमत के अंदाज़ निराले हैं
हर दिल की मुहब्बत से रौशन ये उजाले हैं

कुछ ऐसी नफ़ासत से उठती है नज़र उस की
मुश्किल से बहुत अपने हम दिल को सँभाले हैं

पैग़ाम मेरा ले के पहुंचाए जो जन्नत में
क़ासिद हैं कबूतर वह जो ख़्वाब ने पाले हैं

सूरत जो दिखे गोरी सब जान हैं छिड़कते
क्यों भूल ये जाते हैं भगवान भी काले हैं

टुकड़े हैं कलेजे के इक रोज़ वह आयेंगे
ऑंखों में अभी तक भी उम्मीद के जाले हैं

है ज्वार समन्दर में लहरें लगीं डराने
चप्पू सभी कश्ती के तूफ़ां के हवाले हैं

आँखों की तिजोरी में अश्कों को छुपा रक्खा
लब पर तो लतीफ़े हैं आवाज़ में छाले हैं