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अवध की ख़ाके-हसीं / अली सरदार जाफ़री

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गुज़रते बरसात आते जाड़ों के नर्म लम्हे
हवाओं में तितलियों के मानिन्द उड़ रहे हैं
मैं अपने सीने में दिल की आवाज़ सुन रहा हूँ
रगों के अन्दर लहू की बूँदें मचल रही हैं
मिरे तसव्वुर के ज़ख़्म-ख़ुर्दा उफ़क[1] से यादों के कारवाँ यूँ गुज़र रहे हैं
कि जैसे तारीक[2] शब[3] के तारीक आसमाँ से
चमकते तारों के मुस्कराते हुजूम गुज़रें

मैं क़ैदखा़ने में इश्क़े-पेचाँ की सब्ज़ बेलों को ढूँढ़ता हूँ
जो फैल जाती हैं अपने फूलों के नन्हे-नन्हे चिराग़ लेकर
कहाँ है वो दिल-नवाज़ बाँहें
वह शाख़े-सन्दल
कि जिस पर अँगडा़इयों ने अपने हसीं नशेमन बना लिये हैं
मैं अपनी माँ के सफ़ेद आँचल की छाँव को याद कर रहा हूँ
मेरी बहन ने मुझे लिखा है
नदी के पानी में बेर की झाड़ियाँ अभी तक नहा रही हैं
पपीहे रुख़सत नहीं हुए हैं
अभी वो अपनी सुरीली आवाज़ से दिलों को लुभा रहे हैं

मैं रात के वक़्त अपने ख़्वाबों में चौंक पड़ता हूँ जैसे मुझको
अवध की मिट्टी बुला रही है
हसीन झीलें कँवल के फूलों की चादरों में ढँकी हुई हैं
फ़ज़ाओं में मेघदूत परवाज़ कर रहे हैं
न जाने कितनी महब्बतों के पयाम लेकर
घटाओं की अप्सराएँ अपनी
घनेरी ज़ुल्फ़ों में आख़िरी बार मुस्करा कर
ख़लीजे-बंगाल[4] और बह्रे-अरब[5] के मोती पिरो रही हैं
हरे परों और नीले फूलों के मोर ख़ुश हो के नाचते हैं

क़दीम गंगा का पाक पानी ज़मीं के दामन को धो रहा है
वो खेतियाँ धान से भरी हैं
जहाँ हवाएँ अज़ल के दिन से सितार अपने बजा रही हैं
हिमालय की बुलन्दियाँ बर्फ़ से ढकी हैं
उन आसमाँ-बोस चोटियों को
सहर के सूरज ने सात रंगों की कल्ग़ियों से सजा दिया है
शफ़क़ की सुर्ख़ी में मेरी बहनों की मुस्कराहट घुली हुई है

मिरे तसव्वुर में साक़ियों का ख़िरामे-रंगीन न जामो-मीना की गर्दिशें हैं
न मयकदे हैं न शोरिशें[6] हैं
मैं छोटे-छोटे घरों की छोटी-सी ज़िन्दगी में घिरा हुआ हूँ
अँधेरे क़स्बों को याद करके तड़प रहा हूँ
वो जिनकी गलियों में मेरे बचपन की यादें अब तक भटक रही हैं
जहाँ के बच्चे पुराने कपड़ों की मैली गुड़ियों से खेलते हैं
वो गाँव जो सैकड़ों बरस से बसे हुए हैं
किसानों के झोंपड़ों पर तरकारियों की बेलें चढ़ी हुई हैं
पुराने पीपल की जड़ में पत्थर के देवता बेख़बर पड़े हैं
क़दीम बरगद के पेड़ अपनी जटाएँ खोले हुए खड़े हैं

ये सीधे-सादे ग़रीब इन्सान नेकियों के मुजस्समे हैं
ये मेहनतों के ख़ुदा ये तख़लीक़ के पयम्बर
जो अपने हाथों के खुरदुरेपन से ज़िन्दगी को सँवारते हैं
लोहार के घन के नीचे लोहे की शक्ल तब्दील हो रही है
कुम्हार का चाक चल रहा है
सुराहियाँ रक़्स कर रही हैं
सफ़ेद आटा सियाह चक्की से राग बनकर निकल रहा है
सुनहरे चूल्हों में आग के फूल खिल रहे हैं
पतीलियाँ गुनगुना रही हैं
धुएँ से काले तवे भी चिन्गारियों के होंटों से हँस रहे हैं
दुपट्टे आँगन में डोरियों पर टँगे हुए हैं
और उनके आँचल से धानी बूँदें टपक रही हैं
सुनहरी पगडण्डियों के दिल पर
सियाह लहँगों की सुर्ख़ गोटें मचल रही हैं

यह सादगी किस क़दर हसीं है
मैं जेल में बैठे-बैठे अकसर यह सोचता हूँ
जो हो सके तो अवध की प्यारी ज़मीन को गोद में उठा लूँ
और उसकी शादाब लहलहाती हुई जबीं को
हज़ारों बोसों से जगमगा दूँ

मैं अपने बचपन के साथियों की गरजती आवाज़ सुन रहा हूँ
वो कारख़ानों के सामने इन्क़िलाब बनकर खड़े हुए हैं
वो खेतियों में बहार बनकर रवाँ-दवाँ हैं
अँधेरी कानों की तीरगी में
वो नूर बनकर उतर रहे हैं
ज़मीं के सीने पे काश्तकारों की लाठियों के
हज़ारों जंगल उगे हुए हैं
कुदालें खेतों की पासबाँ हैं, दरातियाँ जगमगा रही हैं

ग़रीब सीता के घर पे कब तक रहेगी रावण की हुक़्मरानी
द्रौपदी का लिबास उसके बदन से कब तक छिना करेगा
शकुन्तला कब तक अन्धी तक़दीर के भँवर में फँसी रहेगी
यह लखनऊ की शिगुफ़्तगी[7] मक़बरों में कब तक दबी रहेगी
सरों के ऊपर मुसीबतों के पहाड़ कब तक गिरा करेंगे
ख़बासतें[8] कब तलक अहिंसा का रूप धारे फिरा करेंगी

किसान जो अपनी धरती पे जानवर की तरह झुके हैं
वो जिनकी पीठों पे भारी ईंटें लदी हुई हैं
जो कच्चे चमड़े के सख़्त जूतों से पिट रहे हैं
ये जिस्म जो कारख़ानेदारों की भट्ठियों मे उबल रहे हैं
ये हाथ लोहे के दाँत जिनको चबा रहे हैं
ये ख़ून जो नफ़ाख़ोर
 बनियों की थैलियों में खनक रहा है
ये औरतें जिनके हाथ पीछे बँधे हुए हैं
जो ऊँचे पेड़ों पे अपने बालों की फाँसियों में लटक रही हैं
यह काँपती मुफ़लिसी[9] जो आयी है छातियों का लगान लेकर
ये नन्हे बच्चे जो मालिकों के मवेशियों को चरा रहे हैं
जो खेत मज़दूर भूके रहकर ज़मीं से गेहूँ उगा रहे हैं
ये अपने सीने की आग कब तक दबा सकेंगे
ये अपनी नफ़रत का ज़हर कब तक छुपा सकेंगे
ये ज़ख़्म कब तक हरे रहेंगे

अवध की ख़ाके-हसीं के ज़र्रे बगूले बनकर मचल रहे हैं
अब आँसुओं की पुरानी झीलों से सुर्ख़ शोले उबल रहे हैं
ग़मों की भारी सिलें दिलों से सरक रही हैं
शुजाअतें[10] गोफनों को लेकर निकल रही है
झुके हुए सर उभरते सूरज की शानो-शौकत से उठ रहे हैं
यह सूरमाओं की सरज़मीं है
यह आसमाने-ख़मोश तूफ़ाने-बर्क़ो-बाराँ[11] का आसमाँ है
यह मुस्कराती हुई फ़ज़ा सुर्ख़ आँधियों से भरी हुई है
यहाँ का एक-एक चप्पा लाखों बग़ावतों से बसा हुआ है
बग़ावतें जो हर-इक शहनशाहियत की चूलें हिला चुकी हैं
बग़ावतें जो साम्राज को बलन्दियों से गिरा चुकी हैं
बग़ावतें जो फ़िरंगियों के दिलों पे हैबत बिठा चुकी है
यही पुरानी बग़ावतें फिर नये सिरे से जवाँ हुई हैं
मिरे वतन की ज़मी को नापाक करने वालो
मैं उन पुरानी-नयी अवामी बग़ावतों ही का तरजुमाँ हूँ
मैं अपने अहले-वतन के एहसास और जज़्बात की ज़बाँ हूँ

अवध की ख़ाके-हसीं के ज़र्रो
जो सैंकड़ों मील दूर से उड़के मेरे ख़्वाबों में आ गये हो
मिरे वतन की ज़मीं से मेरा सलाम कहना
उसे बताना
कि मेरे होंठों पे संगो-आहन की सर्द मुहरें लगी हुई हैं
वह काला क़ानून एक दीवार बनके रस्ते में आ गया है
जिसे अहिंसा का नाम लेकर पुजारियों ने खड़ा किया है
मगर यह दीवार रोक सकती नहीं हैं मुझको
उबलते ज्वालामुखी को कोई दबा सका है?
मैं आज मजबूर हूँ तो क्या है
वतन से कुछ दूर हूँ तो क्या है
मगर मैं उसके जुजाहिदों की सफ़ों से बाहर नहीं गया हूँ

शब्दार्थ
  1. क्षितिज
  2. अँधेरी
  3. रात
  4. बंगाल की खाड़ी
  5. अरब सागर
  6. झगडे़
  7. प्रसन्नता
  8. दुष्टता
  9. ग़रीबी
  10. वीरता
  11. बिजली और बादलों के तूफ़ान