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अविरल सृष्टि क्रम / मृदुल कीर्ति

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जीवन पल-पल ही चुकता है, मदिर-मदिर ही फल पकता है,
'उर्वारुकमिव' बन्ध मोक्ष का, अविरल सॄष्टि क्रम चलता है।
पल बनता और पल मिटता है।

सदा कहाँ सम्बन्ध किसी से, व्यर्थ मोह पाशों बंधता है,
फल पकने के बाद स्वयं ही, तरुवर सारे फल तजता है।
कोई सदा कहाँ टिकता है।

इन्द्रिय जनित ज्ञान सब नश्वर, माया जनित सदा छलता है,
मोहक मोह भ्रमित मति मूरख, निपट भ्रान्ति जो सच लगता है।
जीव तो भ्रमित रहा करता है।

तुम्हें प्यार का भ्रम है केवल, प्यार के नाम सदा छलता है,
बिछा मोह का ताना-बाना, जग उपयोग किया करता है।
पल-पल जीवन भर ठगता है।

सत को स्वप्न, स्वप्न की सत्ता, मान मुदित मन क्यों रहता है?
काल चक्र में चुकता जीवन, सिकता मुठ्ठी ज्यों बहता है।
इसी तरह जीवन बहता है।

माटी के तन रहने के हित, पाथर महल व्यर्थ चुनता है,
देह, गेह और नेह का बंधन, बहु जन्मों तक ना चुकता है।
जीव क्यों नहीं तू सुनता है?

इधर गिने बहु कंचन कंकर, उधर सांस कोई गिनता है.
मूरख सोचे, माया पाई, उधर सांस का धन घटता है।
जीव नहीं तू क्यों डरता है?

मृणमय जीव ब्रह्म है चिन्मय, अणु -कण में उसकी सत्ता है
काल प्रभंजन, तृणमय तन को, कब ले उड़े, पता चलता है?
अंतर्ज्ञान सदा टिकता है।

उदय संग ही अस्त उपजता, अस्त के साथ उदय चलता है
इधर सृजन और उधर विसर्जन, फिर भी भजन नहीं करता है।
जीवन व्यर्थ किया करता है।

कर्म विधान अटल और निश्चित, टाले नहीं टला करता है,
योग वियोग जगत के नियमन, व्यर्थ प्रलाप किया करता है।
ब्रह्म विधान, यही कहता है।

पल-पल ही जीवन चलता है, मदिर-मदिर ही फल पकता है।