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अष्टम उमंग / रसरंग / ग्वाल

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शृंगारेतर रसवर्णन

हास्य रस (दोहा)

हास्य आदि बसु रसन में, षट स्वनिष्ट-परनिष्ट।
रौद्र-वीर रस ये दुहूँ, हैं केवल परनिष्ट॥1॥
भेष-बचन-गति-आचरन, होंय और के और।
प्रीय प्राप्त जुत जानिये, आलंबन सिरमौर॥2॥
उद्दीपन तिन इंगितै, दृग विकसाद्यनुभाव।
संचारी हर्षादि हैं, हाँसी थाई गाव॥3॥
थाई पूरन होंन तें, होत हास्य रस आइ।
सुक्ल बरन ससि देवता, बरनत हैं कबिराइ॥4॥

हास्य रस स्वनिष्ठ, यथा (कवित्त)

सुनिकै बिहंग सोर, भोर उठी नंदरानी,
अंग-अंग आलस के जोर जमुहानी वह।
धारी जरतारी सो न सूधी की सम्हार रही,
कान्ह कों बिरावत खिलावत सिहानी वह।
‘ग्वाल’ लखि पूत की सु हीरा धुकधुकी माहिँ,
छबि सब आपुनी अजायब दिखानी वह।
एक संग ऐसी खिल-खिल करि उठी भोरी,
आँसू आइ गये, पै न खिलन रुकानी वह॥5॥

हास्य परनिष्ठ, यथा

बाहर बबा के पास खेलि-खेलि ख्यालन कों,
धायो इकबारगी (पै), पौरि पैठि पिलि गयो।
साँवरो सलोनो मंजु, मृदुल हँसौना वह,
कर में खिलौना लिये, जा पै दीह दिल गयो।
‘ग्वाल’ कवि चिबुक अधर दधि लागि रह्यो,
काजर हू फैलिकै कपोलन सों मिलि गयो।
देखि यह कौतुक न मिलि सक्यो जसुधा पै,
खिल-खिल करत अखिल मुख खिल गयो॥6॥

(सवैया)

वृषभानलली छलिबे के लिये, हरि के जु उमंग-सी आइ गई।
उचके, कुच के थल गेंद धरी, अँगिया छतियाँ पर छाइ गई।
कवि ‘ग्वाल’ सिँगार सजाइ गये, कही राधिका कोउ भुलाइ गई।
सम देखत ही पियै पाइ गई, हँसतें-हँसतें हहराय गई॥7॥

करुण रस लक्षण (दोहा)

इष्टनास या नासवत, आपद बंधन आदि।
ये आलंबन तासु तें, थित भव सोक अवादि॥8॥
किहुँ इष्ट सु गुनकथन, आदि उदीपन गाउ।
रुदन निरासा भूपतन, आदि लखौ अनुभाउ॥9॥
दैन्य सुमृति निरवेद कहि, मोहादिक संचारि।
थिति पूरन के होंन तें, करुना रस निरधारि॥10॥

करुण स्वनिष्ठ, यथा (कवित्त)

कोऊ एक भूपति सिकार गयेा हो वन,
सुतहू सिकार कों गयो हो करि चित्त चाइ।
मृग पै लगायो अस्व, साधिकै बंदूक मारि,
ताही समै झाड़ी तें, सु दोर्यो भयो पूत आइ।
‘ग्वाल’ कवि कहत अचानचक ताकों लगी,
ताकत ही कौतुक निरासता बदन छाइ।
रोवै गुन गाइ-गाइ, कहै हाय-हाय गहै,
धाइ-धाइ फिर सीस, कूटै है दाइ-दाइ॥11॥

करुण परनिष्ठ, यथा

सहज सुभाय कान्ह मुष्टिकादि मल्ल मारि,
मंच पै उछलि गयो, जहाँ कंस जो वही।
केस गहि ताके डार्यो भूमि, तापै कूदै आप,
प्रान हरि ताके वाले मामा भले सोवही।
‘ग्वाल’ कवि कहै रनवास में सुनी यों जब,
हाय-हाय माची, हिय-हिय कों बिलोवही।
बिरह बरानी बिकलानी महा मुरझानी,
गुन की कहानी, कहि-कहि रानी रोवहीं॥12॥

रौद्र रस लक्षण (दोहा)

सुनिबो लखिबो सत्रु कों, पुनि अपराध बखानि।
बहुरि अवज्ञा आदि दै, आलंबन पहचानि॥13॥
तातें उपजै क्रोध जो, सो थाइ बरनाइ।
आलंबन की चेस्टा, उद्दीपन सरसाइ॥14॥
अधर चाबिबो, भू चढन, दृग अरुनाद्यनुभाव।
संचारी आवेग अरु, उग्रतादि पुलकाव॥15॥
थाई पूरन के भये, होत रौद्र रस आइ।
राते रंग बखानिये, रुद्र देवता गाइ॥16॥

यथा (कवित्त)

लंका तें निकसि आये, जुत्थन के जुत्थ लखि,
कूद्यो बज्र-अंग किटकिटी दै झपट्टि कै।
सुनि-सुनि गर्वित बचन दुष्ट पुष्टन के,
मुष्ट बाँधि उच्छलत साम्हने सपट्टि कै।
‘ग्वाल’ कवि कहै महामत्ते रत्ते अक्ष करि,
धावै जित्त तित्त परै बज्र सो लपट्टि कै।
चब्बत अधर फैंकै पब्बत उतंग तुंग,
दब्बत दनुज्जन के दलन दपट्टि कै॥17॥

वीररस लक्षण (दोहा)

वीर चार जुध दान पुनि, दया धर्म में होय।
थिति उत्साह जु गौर रँग, इंद्र देवता जोय॥18॥
संचारी चारोंन में, मति आवेग’रु गर्व।
पुलक उग्रता धीरता, हर्षादिक हैं सर्व॥19॥

युद्धवीर लक्षण

समै सत्रु देखन-सुनन, निज बल पूरन आदि।
जुद्धबीर रस के कहत आलंबन जु अवादि॥20॥
निज दल सस्त्र जु श्रेयता, वीरन कों वीरत्व।
इत्यादिक उदिपन कहौं, सरसावै रस तत्व॥21॥
फरकन भुज अरु अधर को, विकसित तन, मुख लाल।
जुद्ध उछाही दृष्ट कहि, ये अनुभाव बिसाल॥22॥

यथा (कवित्त)

मरकट रिच्छ के संघट्ट लै कै रघुबीर,
चले गढ़ बंका लंका चित्त करि निरना।
अच्छन में ओज लाली वक्त्र में विलच्छनता,
दच्छन प्रतच्छ भयो हरिनी लै हिरना।
‘ग्वाल’ कवि लखि भुजदंडन कोदंड और,
उच्चरे उमंड आज रावन सों भिरना।
रत्थ बिन रत्थ में ते ताके दसों मत्थ काटि,
दैहों निज हत्थ, रुद्र हत्थ मैं सुमिरना॥23॥
बल के उमंड भुजदंड मेरे फरकत,
कठिन कोदंड खेंचि मेल्यो चहैं कान तें।
चाउ अति चित्त में चढ्यो ही रहै जुद्ध हित्त,
जुटै कब रावन जु बीसहू भुजान तें।
‘ग्वाल’ कवि मेरे इन हत्थन को सीघ्रपनो,
देखँगे दनुज्ज-जुत्थ गुत्थित दिसान तें।
दसमत्थ महा होय जो पै सो सहस्र-लक्ष,
कोटि-कोटि मत्थन कों काटों एक बान तें॥24॥

दानवीर लक्षण (दोहा)

तीरथ जाचक पर्व धन, आलंबन इत्यादि।
उद्दीपन दात्रतु और कों, फलस्तुति जु अवादि॥25॥
दृग विकसन मुसिकान मृदु, दानभरी जे द्रिष्ट।
इत्यादिक अनुभाव हैं, लखिहैं बुद्धि वरिष्ठ॥26॥

यथा (कवित्त)

आये मोसों जाचन कों येहो तपतेजपुंज,
मैं हौं रघुबीर उर धार्यो दान-प्रन कों।
चाहिये जो लक्ष लेहु, कोटि-कोटि, चाहि पदम,
चाहि लेहु अब तामें गिनौं ना रतन कों।
‘ग्वाल’ कवि और नृप दानी की कहौं का कथा,
सब तें सरस लीजे, कीजे मोद मन कों।
साजि-साजि बाजि देऊँ, माते गजराज देऊँ,
राज सब देऊँ, देऊँ देह हू दुजन कों॥27॥

दयावीर लक्षण (दोहा)

आलंबन दीन‘रु दुखी, उदिपन ताकों दुःख।
अति कृपालता की लखनि, है अनुभाव जु मुख्ख॥28॥

यथा (कवित्त)

परदुःख दलिबे को पर्यो है सुभाव मेरो,
काहू सुनि पाऊँ दुखी, जाऊँ तहाँ दौरि कै।
लाख-लाख भाँति सों, मिटाय देऊँ दुःख ताको,
देख मैं सकौं ना दुखी, जन काहू तौर कै।
‘ग्वाल’ कवि मेरी ऐसी रीति की उमंगन कों,
जानि रहे जान औ’ अजान सब ठौर के।
जैसे सिबि नृप नें बचायो हो कपोत-पोत,
तैसे हौं हूँ तन दै, बचाऊ प्रान और के॥29॥

धर्मवीर लक्षण (दोहा)

श्रुति स्मृति आलंबन जु, उदिपन फलश्रुत्यादि।
धर्म आचरन द्रिष्ट जुत, कहि अनुभाव अवादि॥30॥

यथा (सवैया)

झूँठ न बोलिबे को फल दीरघ, वेद उचारत आठहु जामा।
सो सुनि हीय उमंग जमी रहै, धार लियो प्रन मैं सुख-धामा।
जीत चहौं कवि ‘ग्वाल’ मैं नीत में, धर्मसुतान विख्यात है नामा।
जीवत सत्य न त्यागिहौं मैं कभूँ, कैसे कहौं मरो अस्वत्थामा॥31॥

भयानक रस लक्षण (दोहा)

भयदायक जो होय कछु, अपराधादि अधार।
तातें भय आवै उपजि, सो थाई अवधार॥32॥
असहायत्व उदीपनै, निस्चय करि जय धारि।
त्रास दैन्य आवेग पुनि, चपलतादि संचारि॥33॥
कंप पुलक बिबरन सिथिल, इन्हें आदि अनुभाव।
भय थित पुरैं भयानक जु, असित, देव जमराव॥34॥

स्वनिष्ठ भयानक, यथा (सवैया)

मोतें क्यों नृप को अपराध है, जो भयो जाहर तो कठिनाई।
काँपत ही दिन-रात रहौं नित, नींद न भूख, तृषा हू हिराई।
त्यों कवि ‘ग्वाल’ दिवान हू सों, इक मैंने करी हुती आगै खुराई।
हाय कहा करौं, जाऊँ कहाँ भजि, कासौं कहौं, नहिं कोऊ सहाई॥35॥

परनिष्ठ भयानक, यथा (कवित्त)

भई न भवानी एरे कंस तोहि हनवैया,
लै चुक्यो जनम, यह वाक्य भयो ब्याल ही।
अति घबरायो फेर सुन्यो पूतनादि बध
धन्वा के टूटत भयो साल पर साल ही।
‘ग्वाल’ कवि कहै थहराय-थहराय जाय,
जगत भुलाय गयो फँस्यो एक जाल ही।
चौंकि-चौंकि उचकि-उचकि परै पलिका पै,
उठै बरराय आयो-आयो कृष्ण काल ही॥36॥

बीभत्स रस लक्षण (दोहा)

ग्लानादिक वस्तु अकर्म अरु, आलंबन इत्यादि।
तिनकी है जु विसेषता, उद्दीपन जु अवादि॥37॥
तातें उपजै ग्लानि जो, सो थाई बरनाय।
संचारी बैबर्नता, आवेगादि गिनाय॥38॥
मुख-दृग-नासा मूँदिबो, सिकुरनादि अनुभाव।
थाई पूर बीभत्स रस, महाकालनी लाव॥39॥

स्वनिष्ठ बीभत्स, यथा (कवित्त)

जानैं कौंन तप तें मैं विप्र को जनम पायो,
दूजैं पाई पूजा में सदाई सीता राम की।
तिनहू के भूषन चुराई भेजे कई बार,
पंथी लूटि-लूटि लीने, तृस्ना करि धाम की।
‘ग्वाल’ कवि जाहरी सो ह्वै गई जिहान हाय,
धिकाधिक भाखैं लोग, ख्वारी भई नाम की।
जात रही सेखी, सब बात की, हितून में तें,
तो पै अब जिन्दगी रही तो कहा काम की॥40॥

परनिष्ठ बीभत्स, यथा

काहू एक भूप पर, भूप चढ़ि आयो और,
जुट्टि-जुट्टि भटन चलाई अति तरवार।
लुत्थन पै लुत्थैं परीं, श्रोनधार पत्थैं परी,
मास-चरबी परी, माँखिन की भिनकार।
‘ग्वाल’ कवि कहै तहाँ कहूँ तें बटोही आये,
रुके एक संग पाय, दुरगंध को गुबार।
नासिका कों मूँदेहू पै, दृगन सिकोरेहू पै,
गिरि-गिरि परैं भू पै, मुख वारि डार-डार॥41॥

अद्भुत रस लक्षण (दोहा)

अतिसयार्थ जुत अदभुतहिँ, आलंबन मनमानि।
चमतकार चेष्टा सु तिहिँ, उद्दीपन पहचानि॥42॥
तातें उपजै आचरज, सोई थाई भाव।
स्तंभ स्वेद पुलकादि पुनि, संचारी बरनाव॥43॥
अनिमिख दृग चक्रित रहन, गद्गद बच अनभाउ।
पूरैं थिति अदभुत जु रस, बिधि सुर, रँग पयराउ॥44॥

स्वनिष्ठ अद्भुत रस, यथा (कवित्त)

नदी-तट नल-नील, खेलैं गेंद पाहन की,
अचकाँ उछरि गई बीच जलधार के।
लागी सो तरन, तकि चौंकि परे, देखि रहे,
बोले आगे डूबत ही बैठत हे हार के।
‘ग्वाल’ कवि निश्चै हित गिर डारे, वेऊ तरे
तब अति चक्रित परे बिचै बिचार के।
कर भये औरैं, किधौं कर करामाती भये,
कैंधों परि गये पोले, पुंज ये पहार के॥45॥

परनिष्ठ अद्भुत रस, यथा

रिस करि लेजैं लै कै पूतै बाँधिबे कों लगी,
आवत न पूरी, बोली कैसो यह छोना है।
देखि-देखि देखैं फिर, खोलकैं लपेटा येक,
बाँधन लगी तो वह क्योंहूँ कै बँधौ ना है।
‘ग्वाल’ कवि जसुधा चकित यों उचारि रही,
आली यह भेद कछू परै समझौ ना है।
यही देवता है, किधौं याके संग देवता हैं,
या किहूँ सखा ने करि दियो कछु टोना है॥46॥

शान्तरस लक्षण (दोहा)

गुरु उपदेस अनित्यता, आलंबन जिय जोय।
तीरथादि सतसंग हू, उदिपन यामें होय॥47॥
उपजि परै निरवेद थिति, धृति मति आदि सँचारि।
समदृष्टी जु विरक्तता, अनुभाव (सो) उचारि॥48॥
परिपूरन थिति होंन तें, सांत जु रस सुखदाइ।
सेत बरन, सुर संत हैं, बरनत कवि समुदाइ॥49॥

स्वनिष्ठ शान्त रस, यथा (कवित्त)

जानि पर्यो मोकों जग असत अखिल यह,
धु्रव आदि काहू कों न सर्वदा रहन है।
यातें परिवार-व्यवहार-जीतहारादिक,
त्यागि कररि सब ही बिकसि रह्यो मन है।
‘ग्वाल’ कवि कहै मोद काहू में रह्यो न मेरो,
क्योंकि काहू के न संग गयो तन-धन है।
कियो मैं बिचार, एक ईश्वर ही सत्य नित्य,
अलख अपार चारु चिदानंद घन है॥50॥

परनिष्ठ शान्त रस, यथा

कछुक दिना तें मीत मेरे का भयो हियो,
पियो कथारस ही, सुधि ना रही बिछौने की।
है असत्त जग्त, सुनते ही यों विरक्त भयो,
व्यक्त करि दीनी चाह, चाँदी अरु सोने की।
‘ग्वाल’ कवि तापै फेर संतन की संगति सों,
रंगित भई हैं आँख, होत ज्यों है सोने की।
ध्यान धु्रव धारे रहैं, नाम कों उचारे रहैं,
मूरति निहारे रहैं, साँवरे सलोने की॥51॥

गुरु उपदेश

राम घनस्याम के न नाम तैं उचारे कभूँ,
काम बस ह्वैकै, बाम गरे बाँह डाली है।
एक-एक स्वाँस ये अमोल कढ़े जात हाय,
लोल चित्त यहै ढोल फोरत उताली है।
‘ग्वाल’ कवि कहै तू बरस बढ़ै मेरे एरे,
घटै छिन-छिन यह आयु की बहाली है।
जैसें धार दीखत फुहारे की बढ़त आछैं,
पाछैं जल घटै, हौज होत आवै खाली है॥52॥
आयो तू कहाँ तें, उपजायो कौन-कौन बिधि,
पालिकै बढ़ायो कहौ, कौन करकस तें।
कौन सो करार कौन-कौन करि आयो फेर,
आइकै भुलायो छक्यो काम बरकस तें।
‘ग्वाल’ कवि कहै तें न आपमें बिचार्यो ब्रह्म,
जुदो हू न जानि भज्यो, भ्रम्यो अरकस तें।
खास-खास स्वाँस माहिँ, स्याम अंग तें कढ़त,
जैसे जंग परे, कढ़ै तीर तरकस तें॥53॥

रंक जात कीन्हे पंक जात जाके नैनन ने,
ऐसे स्याम गात के न ध्यान में समात है।
चंदमुखी सामने दिखात हरखात, ख्यात-
संपत्ति जमात में भुलात हुलसात है।
‘ग्वाल’ कवि जीवन के तात-मात, तात-भ्रात,
खोवैं निज घात, नर-देही करामात है।
यह मत जानै दिन जात, रात जात भैया,
बात-बात माहिँ बात जात, बात जात है॥54॥
धन है न तेरो कोऊ, तन है न तेरो इहाँ,
प्रन है न तेरो, बन बैठ्यो गर्व भारी सों।
पितु है न तेरो तकि, चित्त है न तेरो फेर,
‘मेरी यह मेरो’ बस्यो ही में जोर वारी सों।
‘ग्वाल’ कवि मेरो यह तेरो सो अँधेरो भयो,
ताहि करि दूर बोध चंद उजियारी सों।
नग हैं न तेरे नर, नग हैं न तेरे संग,
नग हैं न तेरे, पग क्यों न नगधारी सों॥55॥
जोई तन तनक न भूमि मंे लगत हुते,
सोई तन भूमि खोदि गाडें नौन संग में।
जोई तन तनक सकै न धूप कोई नर,
सोई तन गीध-स्वान चौंथत उमंग में।
‘ग्वाल’ कवि जो तन दुसालन लपेटे हुते,
सो तन जरत देखि चेति, का उतंग में।
जोई तन अतरन के हौज में तरे हैं सोई,
तूंबा-से तरत डोलैं तोय के तरंग में॥56॥
साथी सब स्वारथ के, हाथी-हय हेत वारे,
हाथ-पाँव अंग में, भरोसो है न काहू को।
माता-पिता भ्रात-गोत नाता रह्यो ताँता पूर,
पूत अपनो है पै स्वास है न जाहु को।
‘ग्वाल’ कवि सुख में सनेही हैं सभी के सब,
दुख की दरेरन में, होत है पनाहू को।
यातें उर धार, एक रामै पखबार तेरो,
रामै रखवार और कोऊ है न काहू को॥57॥
मात कहै तात अरु तात कहै तात मेरो,
भ्रात कहै भ्रात मेरो जात-जात जपनो।
ताई कहै मेरो अरु माई कहै मेरो लाल,
बाल कहै वाह यह मेरो माल थपनो।
‘ग्वाल’ कवि कहै, कहैं सासुरे जमाई मेरो,
बहन कहै भाई मेरो, दाई कहै ढपनी।
तजिकै विवेक (और) सजिकै कुटेव लेखो,
देखो जीव एक कों अनेक कहैं अपनो॥58॥

भक्तिपक्ष

गीधे गीध तारिकै, सुतारिकै, उतारिकै जू,
धारिकै हिये में निज बात जरि जायगी।
तारिकै अवधि करी, अवधि सु तारिबे की,
बिपति बिदारिबे की फाँस कटि जायगी।
‘ग्वाल’ कवि सहज न तारिबो हमारेा गिनो,
कठिन परैगी, पाप-पाँति पटि जायगी।
यातें जो न तारिहों, तिहारी सौंह रघुनाथ,
अधम उधारिबे की साख घटि जायगी॥59॥
जोय-जोय जोयन कों मोहन भये ही रहौ,
लोचन लगालग में बपुष बिसारैं ई।
जागे जोग जप में न तप अनुरागे कभूँ,
लागे रूप अपमैं सु पैरन अपारैं ई।
‘ग्वाल’ कवि यातें तुम संकित न हूजै राम,
नाम रखिबे हैं तो परैगी पैज पारैंई।
टारैं ना बनेगी अब, डारै ना बनैगी बात,
धारैं ही बनैगी जी, बनैगी आज तारैंई॥60॥
पापन की धारी लौं, उधारी उरधारी सदा,
ब्रत न सुधारी कहौं मोसों और कौन है।
तारी कहवाय जो ना मेरी तुम तारी बात,
ये ही अफसोस कहौ ऐसो और कौन है।
‘ग्वाल’ कवि गनिका उधारी नाम प्रन वारी,
ये ही आस भारी औ’ भरोसो और कौन है।
नारी जो बिपत्ति वारी, सिला ही बिपत्ति वारी,
करी सो बिपत्ति वारी, तासों और कौन है॥61॥

रीझन तिहारी न्यारी, अजब निहारी नाथ,
हारी मति व्यासहू की, पावत न ठौर है।
नाम लियो सुत को, सु हित को बिचार्यो निज,
गनिका पढ़ायो सुक, तापै करी दौर है।
‘ग्वाल’ कवि गौतम की नारी ह्वै सिला सरूप,
कीयो कब तरिबे कों, कहौ कौन तौर है।
पति की पतारी हुती, पतिक कतारी ताहि,
तारी तुम राम तारी, तुमसों न और है॥62॥
गिर से कुचन लाय, तिन्हें सहरावै रमा,
भावै वह आपकों, अजब उपचार है।
गौतम की नारी, सिला भारी ह्वै परी ही नाथ,
ताही पैं पधारे त्यागि मग मृदु तार है।
‘ग्वाल’ कवि कहै यातें इक थल और ह्वैहै,
ताहि मैं बताऊँ, जातें रुचि सुख-सार है।
सिलहू तें हृदय कठोर मेरी महाराज,
तापैं पग धार भलें करिये बिहार है॥63॥
ग्रस्यो ग्राहराज गहकि गजराज गोसें,
बल के भरोसे ऐसैं जोसैं जी उमहतो।
ग्राह खैंचे जल माहिँ, गज खैंचे थल याहि,
खलबल माच्यो जल उछल न बहतो।
‘ग्वाल’ कवि तब गज लै कै सुंड पुंडरीक,
तुंद करि ऊँची कही हरी मोहि गहतो।
त्यों ही चल्यो चक्र फेर चक्रधर चितै परे,
नहीं तो गरीब-निवाज कहौ को कहतो॥64॥
पानी पीवे हेतु गज, गयो हो अवाह पर,
आइ ग्रस्यो ग्राह ने अथाह बल भर के।
जोर बहु पर्यो (पै) न टार्यो गयो ग्राह तब,
दीन ह्वै पुकार्यो हरि हार्यो मैं तो लरिके।
‘ग्वाल’ कवि सुनत सवारी तजि, प्यारी तजि,
धाये चित्रसारी तजि, नाँगे पाँव ढरके।
जानन परी है कब चक्र चक्रधर जू सों,
चलि दलि नक्र गयो कर चक्रधर के॥65॥
देवन को दुख-दंद, देवकी को फंद कट्यो,
कंस मतिमंद की जमी है नींव काल की।
ब्रजबासी बृंद की, भई जो बात ही पसंद,
रूप की अमंद रासि, खुलि परी ख्याल की।
‘ग्वाल’ कवि श्रुतिन को कंद सो सुछंद भयो,
मोहन बुलंद भयो मूरति रसाल की।
अदभुत चंद भयो, जसुमति नंद भयो,
नंद के अनंद भयो, जै कन्हैयालाल की॥66॥
बाल आय बाल भयो, लोकपाल पाल भयो,
देवन कृपाल भयो, सुखमा को थाल है।
मुनि-मन माल भयो, राधा उर माल भयो,
रूप तिहुँ लोक को, सुताल को बिसाल है।
‘ग्वाल’ कवि गौअन को अदभुत ग्वाल भयो,
गोपिन को ख्याल, नेह-जाल भो रसाल है।
ब्रज इक लाल भयो, जसुधा के लाल भयो,
लाल के भये तें भयो नंदमुख लाल है॥67॥
जाकी तमासव को अनूप मारभा है वही,
मालै गुलाब के झमावे पै लगत हैं।
काली बिष झाली के, फनाली ने परस करि,
भले बज्रपाली और अब लौं सजत हैं।
‘ग्वाल’ कवि कहै प्रहलाद नारदादि सब,
धरि-धरि ध्यान सरवोपरि रजत हैं।
मेरे जान गंगे तुम प्रगटीं तहाँ तें तातें,
मुख्य करि माधव के पद ही पुजत हैं॥68॥
आई कढ़ि गंगे तू पदारबिंद-मंदिर तें,
याही तें गुबिंद-गात स्याम हर ओरे हैं।
फेरि धँसि निकसि परी है तू कमंडल तें,
याही तें बिरंचि परे, पीरे चहुँ कोरे हैं।
‘ग्वाल’ कवि कहै तेरे बिरही बिरंग ऐसे,
गिर ही तिहारे तें बखाने रिस जोरे हैं।
स्याम रंग अंगन तो चाहिये तमोगुनी कों,
धारी सीस ईस, यातें अंग-अंग गोरे हैं॥69॥
जित-जित जातीं जमुना की जोर धारें जुरि,
तित-तित ही में स्यामता की बहु कुंज होत।
जित-जित प्रबल प्रबाहन के सोर सुने,
पाप तित-तित से पटाके खाय लुंज होत।
‘ग्वाल’ कवि तेरे तोय ऊपर विमान आय,
जाय इंदरासन अनंदन के गुंज होत।
तेरी एक बिंदु के कनूका सों हजार चारु,
ताकी कोर-कोर पै कन्हैयन के पुंज होत॥70॥
भाषै चित्रगुप्त सुन लीजे अर्ज यमराज,
कीजिये हुकुम अब, मूँदें नर्क-द्वारे कों।
अधम अभागे औ’ कृतघ्नी कूर कलहिन,
करत कन्हैया कर्न-कुंडल सँवसारे कों।
‘ग्वाल’ कवि अधिक अनीतें-विपरीतें भईं,
दीजिये तुडाय बेगि कुलफ किवारे कों।
हम ना लिखेंगे बही, गम ना जु खैहैं हम,
जमुना बिगारे देत कागद हमारे कों॥71॥
बैल पै चढत, कभूँ फैल कै गरुड़ चढै,
हंस पै दिखात, कभूँ बिचरै अनूपिया।
पाँच मुख सबकों दिखात रहि जात एक,
फेर होय जाय चार-बदन सरूपिया।
‘ग्वाल’ कवि कबहूँ त्रिसूल-चक्र-वीणा धरै,
बाल बन, ज्वान बनै, बिरध बिरूपिया।
तज्जुब तमासो तिरबेनी जू तिहारो तक्यो,
तोमें जे अन्हात, ते बनत बहुरूपिया॥72॥
बरनि-बरनि ब्यासदेव भी थकित होत,
बरन-बरन वाक बानी बरनन है।
बिधि-बिधि बिधिहू बिसेसन बिसेखे देत,
बिधुधर बने बाल गोप-बर तन है।
‘ग्वाल’ कवि बंदत बिलोकियत बेदन में,
बेदन बिदीरन बिनोद बितरन है।
बृंदारक बृंद आइ, बपुष बसिंद बने,
बृंदावन चंद को बिदित वृंदावन है॥73॥
पाँति निगुरी है ते बनावत गुरी है ताहि,
सुमति धुरी है घोर दुरमति चुरी है।
पापन की पंगत झुरी है और दुरी है दूर,
जमुना छुरी है, सो जमेस जू कों बुरी है।
‘ग्वाल’ कवि उकति फुरी है सो मुरी है नाहिँ,
मुक्ति अँगुरी है, जमदूतन कों छुरी है।
धर्म की धुरी है, षट पुरी की सुरी है जोर,
जोति सी जुरी है ऐसी मंजु मधुपुरी है॥74॥
चंदन-कपूर-पूर अतर मसाले करि,
मानिक की गच खुसबोस खगती रहै।
हीरन हजारन सिलान की दिवाले दीह,
तामें प्रतिबिंबन की रासि लगती रहै।
‘ग्वाल’ कवि पन्नन के खंभे नीलमनि छत्र,
मत्त गजमोतिन की प्रभा पगती रहै।
जगा जोति जाहर जवाहर जलूसन में,
राधा जगदीसुरी की जोति जगती रहै॥75॥
राधा महारानी मनि-मंदिर बिराजमान,
मुकुर मयंक से जहाँ जडाव कारी में।
बादले बनाव के बिछौने बिछे बेसुमार,
बीजुरी बिरी बनाय देत बलिहारी में।
‘ग्वाल’ कवि सुमन सुगंधित के सार लै-लै,
सची सुकुमार सो सुँघावै सोभ भारी में।
दारा देवतान की दिमाकदार दिसि-दिसि,
द्वार-द्वार दौरी फिरैं खिदमतदारी में॥76॥



(दोहा)

श्रीराधा पद-पदुम कों, प्रनमि-प्रनमि कवि ‘ग्वाल’।
छमवत है अपराध कों, कियो जु कथन रसाल॥77॥
श्रीराधा जगदीसुरी, यह विनती है मोरि।
निज पद-पदुमन के विषै, लीजै मो मन जोरि॥78॥
जो गोलोकनिवासिनी, सो बृंदावन आय।
उमा-रमा-सीतादि सब, श्री राधामय ध्याय॥79॥
श्री जगदंबा राधिका, त्रिभुवनपति की प्रान।
तिनके पद में मन रहै, श्रीशिव दीजे दान॥80॥

॥इति श्री रसरंगे ग्वालकवि विरचिते शृंगारेतर रसवर्णनं नाम अष्टमो उमंगः॥
समाप्तश्चायं ग्रन्थः। शुभं भूयात्

कवि-कोविद-गुनवंत सों, करौं विनति कर जोरि।
बिगरो बरन सुधारियो, मेरी ओर निहोरि॥
ज्ञान न भाषा, सास्त्र को, उलझ्यो विषय विवाद।
मेरो बालपन जानिकै, छमियो मम अपराध।
सिक्षा-जग को चित्र जो, उससे हिय बेहाल।
तदपि मोद पावें रसिक, जस पावै कवि ग्वाल।

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पक्ष सून्य दरसन नयन, विक्रम संवत भूप।
मगसिर पूनो जीव दिन, हुअ ‘रसरंग’ अनूप॥

--रामानन्द