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अष्टादश प्रकरण / श्लोक 81-90 / मृदुल कीर्ति

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अष्टावक्र उवाचः
चित्त अमृत से है पूरित, योगी का शीतल तथा,
लाभ हानि से परे, नहीं प्रार्थना करता यथा.-----८१

सौम्य जन की स्तुति और दुष्ट की निंदा नहीं,
निष्काम योगी तृप्त, सुख और दुःख की चिंता नहीं.----८२

हर्ष, रोग विहीन ज्ञानी , भावः सम्यक सृष्टि है,
न ही मृत और न ही जीवित , जगत में सम दृष्टि है.----८३

पुत्र स्त्री से विरत, स्वदेह की चिंता नहीं,
मुक्त आशाओं से ज्ञानी, शोभता है हर कहीं ------८४

स्वच्छंद बहु देशों में विचरण, जो मिला पर्याप्त हो,
सर्वदा ही मुदित मन, सोये जहाँ सूर्यास्त हो.----८५

निज भाव भूमि में रहे, संसार विस्मृत हो जिसे,
यह देह जाए या रहे, किंचित न स्मृति हो उसे.----८६

सर्वथा ही विरत ज्ञानी, को न कोई द्वंद है,
सर्व भावों में रमण करता, सर्वदा स्वच्छंद है.-----८७

किंकरी, कंचन और माटी में भी ममता हीन है,
भाव राज तम् के धुलें, ज्ञानी जो आत्म प्रवीण हैं.----८८

सर्वत्र आसक्ति रहित, कुछ वासना हिय में नहीं,
तृप्त ज्ञानी की भला क्या साम्यता जग में कहीं.-----८९

सब देखता, सब बोलता, सब जानता ज्ञानी सभी,
कोई वासना हिय में नहीं,क्या अन्य है प्राणी कभी.----९०